कक्षा 12 हिन्दी साहित्य निराला 'सरोज स्मृति' गीत की सप्रसंग व्याख्या प्रश्न उत्तर । NCERT Notes

कक्षा 12 हिंदी साहित्य के अंतरा भाग-2 में संकलित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' रचित 'सरोज स्मृति' हिंदी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत है। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ की सप्रसंग व्याख्या और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है याद करना बहुत आवश्यक है।

इस पोस्ट में आज हम कक्षा 12 हिंदी साहित्य के पाठ सरोज स्मृति गीत की सप्रसंग व्याख्या और परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर पढ़ेंगे। SK HINDI SIR ब्लॉग पर आपका स्वागत है ।
सरोज स्मृति कक्षा 12 प्रश्न उत्तर नोट्स
कक्षा 12 हिन्दी साहित्य सरोज स्मृति गीत की सप्रसंग व्याख्या प्रश्न उत्तर । 



सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - कवि परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल में हुआ था। उनका मूल निवास स्थान उत्तर प्रदेश का उन्नाव जिला था। निराला जी का संपूर्ण जीवन अत्यंत कठिन संघर्षों और पारिवारिक कष्टों से भरा रहा

युवावस्था में ही उनकी पत्नी, पिता और अंत में उनकी इकलौती पुत्री 'सरोज' का असामयिक निधन हो गया। इन दुखों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया, परंतु उन्होंने साहित्य साधना नहीं छोड़ी। सन् 1961 में इलाहाबाद में इस महान क्रांतिकारी कवि का निधन हो गया।

निराला जी की मुख्य साहित्यिक रचनाएँ -

निराला जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने काव्य और गद्य दोनों विधाओं को समृद्ध किया है।


काव्य संग्रह - 'अनामिका', 'परिमल', 'गीतिका', 'तुलसीदास' और 'कुकुरमुत्ता'।


पाठ्यक्रम के गीत - कक्षा 12वीं की पाठ्यपुस्तक में संकलित 'गीत गाने दो मुझे' और हिंदी साहित्य का प्रथम शोकगीत 'सरोज स्मृति' इनकी मुख्य रचनाएँ हैं।


गद्य रचनाएँ - 'अप्सरा', 'अलका' (उपन्यास) तथा 'लिली' (कहानी संग्रह)।

साहित्यिक विशेषताएँ ( भाव पक्ष ) -

क्रांतिकारी चेतना - निराला जी के काव्य में समाज के शोषित और गरीब वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति तथा शोषक वर्ग के प्रति तीव्र विद्रोह झलकता है।


करुण एवं वात्सल्य रस - अपनी मृत पुत्री सरोज की याद में लिखे गए काव्य में एक असहाय पिता का वात्सल्य प्रेम और गहरा शोक प्रकट हुआ है।

प्रकृति का मानवीकरण - इन्होंने प्रकृति को एक सजीव चेतना के रूप में चित्रित किया है, जहाँ नदी, झरने और फूल मानवीय भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

भाषा-शैली ( कला पक्ष )

भाषा सौष्ठव - निराला जी की भाषा शुद्ध, साहित्यिक और तत्समप्रधान खड़ीबोली हिंदी है, जिसमें अद्भुत गांभीर्य है।


मुक्त छंद के प्रवर्तक - हिंदी कविता को छंदों के पुराने बंधनों से मुक्त कराने का मुख्य श्रेय निराला जी को ही जाता है। उन्होंने मुक्त छंद की शुरुआत की।

अलंकार योजना - इन्होंने पारंपरिक अलंकारों के साथ-साथ छायावाद के आधुनिक अलंकारों, विशेषकर 'मानवीकरण' अलंकार का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है।

निराला जी का हिंदी साहित्य में स्थान -

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी का हिंदी साहित्य में स्थान सर्वोपरि है। वे छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। हिंदी कविता को एक नया रूप और क्रांतिकारी दृष्टिकोण देने के कारण वे युगप्रवर्तक कवि के रूप में सदैव आदरणीय रहेंगे।


निराला की रचना - सरोज स्मृति का परिचय -

 हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'सरोज स्मृति' एक मार्मिक शोकगीत है, जो उनकी अपनी पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु पर केंद्रित है। 

इसमें कवि ने सरोज के सादगीपूर्ण विवाह, उसके लालन-पालन में ननिहाल की भूमिका, और पिता-पुत्री के अटूट स्नेह के साथ-साथ अपने जीवन के दुखों को बहुत ही भावुकता से प्रस्तुत किया है।

इस कविता में निराला जी ने अपनी पुत्री के प्रति पिता के अगाध प्रेम और उसकी मृत्यु पर अपनी गहरी वेदना को व्यक्त किया है। यह रचना न केवल एक पिता की बेबसी को दर्शाती है, बल्कि इसमें जीवन के कठोर संघर्षों और मृत्यु की अंतिम सत्यता को भी रेखांकित किया गया है।


निराला 'सरोज समृति' सप्रसंग व्याख्या - ( सभी 7 भाग ) 

देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल

देखती मुझे तू हंसी मंद, होंठों में बिजली फंसी स्पंद

उर में भर झूलती छवि सुंदर, प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से ली गई हैं, जिसमें कवि अपनी दिवंगत पुत्री सरोज के अत्यंत सादगीपूर्ण और अनूठे विवाह का वर्णन कर रहे हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि निराला अपनी स्वर्गीय पुत्री सरोज के विवाह के क्षणों को याद करते हुए कहते हैं कि बेटी, मैंने तुम्हारा एक बिल्कुल नए प्रकार का सादगीपूर्ण विवाह देखा था जो समाज के अन्य विवाहों जैसा बिल्कुल नहीं था।

जब तुम्हारे ऊपर विवाह के पवित्र कलश का शुभ और मंगल जल डाला जा रहा था, तब तुम लज्जा के साथ मुझे देखकर धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी। तुम्हारी वह रहस्यमयी मुस्कान ऐसी सुंदर लग रही थी मानो तुम्हारे कोमल होंठों के बीच बिजली की कोई चमक कांपकर ठहर गई हो।

उस समय तुम्हारे हृदय में अपने आने वाले सुखद वैवाहिक जीवन के सुंदर सपने तैर रहे थे और तुम्हारी आँखें अपने होने वाले पति की छवि को याद कर रही थीं। तुम्हारा वह रूप बिना कुछ बोले भी अपनी सुंदरता को व्यक्त कर रहा था और तुम्हारी खामोशी में भी एक श्रृंगार रस बह रहा था।

विशेष -

1. पुत्री सरोज के सादगीपूर्ण विवाह की शुरुआत का सुंदर चित्रण किया गया है।

2. भाषा तत्समप्रधान यानी संस्कृत के शब्दों से युक्त खड़ीबोली हिंदी है।
3. होंठों में बिजली फंसी पंक्ति में बहुत सुंदर उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग है।
4. इस पद में शांत भाव के साथ वियोग श्रृंगार रस की प्रधानता दिखाई देती है।

तू खुली एक उच्छ्वास संग, विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग

नत नयनों से आलोक उतर, काँपा अधरों पर थर-थर-थर

देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति, मेरे वसंत की प्रथम गीति

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से उद्धृत हैं, जिसमें कवि विवाह मंडप में बैठी पुत्री सरोज के चेहरे की लज्जा और उसके मर्यादित रूप का वर्णन कर रहे हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि कहते हैं कि उस समय तुम्हारे हृदय में अपने आने वाले सुखद वैवाहिक जीवन के सुंदर सपने तैर रहे थे और तुम्हारी सुंदरता बिना कुछ बोले ही सब कुछ कह रही थी। तुम्हारी एक-एक सांस में एक नया विश्वास झलकता था जो तुम्हारे आने वाले जीवन के प्रति था।

तुम्हारा पूरा शरीर उस पवित्र विवाह के बंधन के प्रति पूरी तरह शांत, गंभीर और समर्पित दिखाई दे रहा था। लज्जा के कारण तुम्हारी झुकी हुई आँखों से जो एक पवित्र प्रकाश नीचे उतरा, वह तुम्हारे सुंदर होंठों पर एक धीमे कंपन के रूप में थरथरा रहा था।

तुम्हारी उस शांत, धैर्यवान और सुंदर रूप की मूरत को देखकर मुझे ऐसा लगा मानो तुम मेरे जीवन के बीते हुए सुखद वसंत काल का पहला मधुर गीत हो जो आज दोबारा जी उठा है।

विशेष -

1. 'थर-थर-थर' शब्दों के प्रयोग में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार दिखाई देता है।

2. पुत्री के रूप को जीवन के वसंत के पहले गीत के रूप में सुंदर प्रतीक दिया गया है।
3. भाषा में तत्सम शब्दों की प्रधानता है जो दृश्य को गांभीर्य देते हैं।
4. मृत पत्नी की छवि बेटी में दिखने के कारण यहाँ स्मरणात्मक भाव व्यक्त हुआ है।


शृंगार रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित धार

गाया स्वर्गीया प्रिया संग, भरता प्राणों में राग-रंग

रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से ली गई हैं, जिसमें कवि अपनी पुत्री सरोज के अनुपम रूप-सौंदर्य को देखकर अपनी स्वर्गीय पत्नी के सुंदर रूप को याद कर रहे हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि सरल शब्दों में कहते हैं कि तुम्हारी सुंदरता को देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी कविताओं का निराकार श्रृंगार आज साक्षात रूप धारण कर सामने आ गया हो। यह वही श्रृंगार रस था जिसे मैंने कभी अपनी स्वर्गीय पत्नी के साथ मिलकर गाया था और जो मेरे प्राणों में उमंग भरता था।

आज वही रूप तुम्हारी सूरत में मुझे दोबारा मिल रहा है। ऐसा लगता है कि मेरी पत्नी का वह रति जैसा अनुपम रूप आकाश से उतरकर बेटी के रूप में धरती पर आ गया है।

तुम्हारी सुंदरता को देखकर ऐसा लगता था कि मानो स्वर्ग की कोई अप्सरा मानव का रूप लेकर धरती पर आ गई हो। तुम मेरे बीते हुए सुखी जीवन का एक जीवित प्रमाण बनकर मेरे सामने खड़ी थीं।

विशेष -

1. 'आकाश बदल कर बना मही' में बहुत ही सुंदर लाक्षणिक प्रयोग किया गया है।

2. शांत रस और वियोग श्रृंगार का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है।
3. कवि की काव्य-चेतना और उसकी व्यक्तिगत चेतना का सुंदर मेल यहाँ दिखता है।
4. भाषा पूरी तरह परिष्कृत और साहित्यिक खड़ीबोली हिंदी है।


हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन, कोई थे नहीं, न आमंत्रण

था भेजा गया, विवाह-राग, भर रहा न घर निशि-दिवस-जाग

प्रिय मौन एक संगीत भरा, नव जीवन के स्वर पर उतरा

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से अवतरित हैं, जिसमें कवि अपनी आर्थिक विपन्नता के कारण बेटी के विवाह में पसरी सादगी और वहाँ के मौन संगीत का वर्णन करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि कहते हैं कि इसके बाद तुम्हारा विवाह संपन्न हो गया, लेकिन इस विवाह में कोई भी सगे-संबंधी या आत्मीय लोग शामिल नहीं थे क्योंकि मैंने किसी को कोई आमंत्रण पत्र नहीं भेजा था।

इस विवाह के लिए कोई आमंत्रण भी नहीं भेजा गया था, इसलिए शादी के समय घर में रात-दिन गाए जाने वाले पारंपरिक गीत और शोर-शराबा नहीं हो रहा था। पूरे घर में चारों तरफ एक सुंदर मौन छाया हुआ था और वही मौन एक शांत संगीत बनकर तुम्हारे नए वैवाहिक जीवन के सुरों में घुल रहा था।

तुम्हारे विवाह में न तो कोई ढोल-नगाड़ा बजा और न ही कोई उत्सव मनाया गया। केवल चारों तरफ फैली हुई वह शांति ही तुम्हारे नए सफर की गवाह बन रही थी।

विशेष

1. 'मौन एक संगीत भरा' पंक्ति में सुंदर विरोधाभास अलंकार दिखाई देता है।

2. इस पद में कवि की आर्थिक तंगी और सामाजिक अकेलेपन का बहुत ही करुण वर्णन है।
3. विवाह के पारंपरिक शोर के स्थान पर मौन को संगीत का रूप दिया गया है।
4. भाषा सरल है लेकिन वह पाठक के हृदय को गहराई से छू लेती है।


माँ की कुल-शिक्षा मैंने दी, पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची

सोचा मन में  - 'वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला'

कुछ दिन रह गृह, तू फिर समोद, बैठी नानी की स्नेह-गोद

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से ली गई हैं, जिसमें कवि एक पिता होकर भी माँ का कर्तव्य निभाने के अपने संघर्ष को दिखाते हैं और सरोज की तुलना शकुंतला से करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि बहुत ही भावुक होकर कहते हैं कि तुम्हारी माँ इस दुनिया में नहीं थी, इसलिए विवाह के समय दी जाने वाली कुल की मर्यादा और गृहस्थी की शिक्षा मैंने स्वयं तुम्हें दी।

तुम्हारी शादी के बाद फूलों की सेज भी मैंने अपने हाथों से सजाई। तुम्हें देखकर मेरे मन में अचानक कालिदास के नाटक की पात्र 'शकुंतला' का विचार आया, क्योंकि शकुंतला की माता भी उसके पास नहीं थी।

लेकिन फिर मैंने सोचा कि शकुंतला की कहानी अलग थी और तुम्हारा पाठ यानी जीवन की परिस्थिति अलग है, क्योंकि शकुंतला की माँ उसे खुद छोड़कर गई थी पर तुम्हारी माँ को मृत्यु ने छीना था।

शादी के कुछ दिन बाद तुम खुशी-खुशी अपने ननिहाल चली गईं और वहाँ अपनी नानी की स्नेह भरी गोद में बैठ गईं।

विशेष

1. यहाँ निराला जी ने पौराणिक पात्र शकुंतला के साथ सरोज की तुलना की है जो अत्यंत सटीक है।

2. एक पिता द्वारा माँ की भूमिका निभाने के संघर्ष का करुण वर्णन हुआ है।
3. भाषा में कोमलता और वात्सल्य रस की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है।
4. 'पाठ अन्य यह, अन्य कला' पंक्ति से कवि का आशय परिस्थितियों की भिन्नता से है।



मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार

वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त, तेरे हित सदा समस्त व्यस्त

वह लता वहीं की, जहाँ कली, खिली तू, स्नेह से हिली, पली

अंत भी उसी गोद में शरण, ली, मूँदे दृग वर महामरण

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' से उद्धृत हैं, जिसमें कवि सरोज को ननिहाल से मिले अत्यधिक प्रेम और अंत में ननिहाल की गोद में ही उसकी मृत्यु होने की गहरी वेदना प्रकट करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - कवि कहते हैं कि वहाँ तुम्हारे मामा और मामी का प्यार तुम्हारे ऊपर इस तरह बरसा जैसे बादल धरती पर बहुत ज्यादा जल बरसाते हैं। बेटी, तुम्हारे जीवन के हर सुख और दुख में हमेशा तुम्हारे मामा-मामी ही साथ खड़े रहे और तुम्हारी भलाई के लिए वे हमेशा दिन-रात व्यस्त रहते थे।

सच तो यह है कि तुम्हारी माँ रूपी वह लता उसी ननिहाल की थी, जहाँ तुम जैसी सुंदर कली खिली और उनकी कोमल तथा स्नेह भरी गोद में खेलकर बड़ी हुई।

लेकिन अंत में जब तुम्हारी भयानक बीमारी और मृत्यु का समय आया, तब भी तुमने उसी ननिहाल की गोद में शरण ली और अपनी आँखें हमेशा के लिए बंद करके महामृत्यु को गले लगा लिया।

तुम अंत समय में भी अपने पिता के पास नहीं आ सकीं और न ही मैं तुम्हारी कोई सेवा कर सका।

विशेष

1. 'भर जलद धरा को ज्यों अपार' पंक्ति में सुंदर उपमा अलंकार का प्रयोग है।

2. 'लता' और 'कली' शब्दों के माध्यम से रूपकातिशयोक्ति अलंकार का उपयोग हुआ है।
3. ननिहाल के सदस्यों के प्रति कवि का गहरा आभार व्यक्त हुआ है।
4. इस पद में करुण रस पूरी तरह से अपने चरम रूप में दिखाई देता है।


यह महत्त्वपूर्ण व्याख्या है - imp

मुझ भाग्यहीन का तू संबल, युग वर्ष बाद जब हुई विकल

दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही

हो इसी कर्म पर वज्रपात, यदि धर्म रहे नत सदा माथ

इस पथ पर, मेरे कार्य सकल, हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल

कन्ये, गत कर्मों का अर्पण, कर, करता मैं तेरा तर्पण ।

प्रसंग  - प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सरोज स्मृति' का अंतिम अंश हैं, जिसमें कवि अपने दुखी जीवन का सार बताते हुए अपनी बेटी को अपने जीवन भर की पुण्य कमाई तर्पण के रूप में भेंट करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या  - मुझ जैसे भाग्यहीन और गरीब पिता का सहारा केवल तुम ही थीं। तुम्हारी मौत के कई वर्षों बाद आज भी जब मेरा हृदय व्याकुल होता है, तो मुझे तुम्हारी यादें तड़पाती हैं। मेरे पूरे जीवन की कहानी सिर्फ दुखों से भरी रही है। मेरे जीवन में इतने कष्ट आए हैं कि जो बातें मैंने आज तक किसी से नहीं कहीं, उन्हें आज इस शोकगीत में क्या कहूँ?

यदि मेरा रास्ता धर्म का है, तो भले ही मेरे अच्छे कर्मों पर बिजली गिर जाए यानी सब नष्ट हो जाए, मैं अपना सिर हमेशा धर्म के आगे झुकाए रखूँगा। जीवन के इस कठिन रास्ते पर चलते हुए मेरे द्वारा किए गए जितने भी अच्छे कार्य हैं, वे भले ही उसी तरह नष्ट हो जाएं जैसे सर्दियों के मौसम में पाला गिरने से सैकड़ों कमल के फूल नष्ट हो जाते हैं।

लेकिन हे पुत्री, मैं अपने जीवन के उन सभी संचित पुण्यों और अच्छे कर्मों की कमाई को तुम्हारे चरणों में अर्पित करता हूँ और उन्हीं पुण्यों के फल रूपी जल से आज मैं तुम्हारा तर्पण यानी श्राद्ध करता हूँ।

विशेष

1. 'दुख ही जीवन की कथा रही' हिंदी साहित्य की सबसे मार्मिक और करुण पंक्ति है।

2. 'शीत के-से शतदल' में उपमा और अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
3. एक पिता द्वारा अपनी बेटी को दिया गया यह सर्वोच्च और अनोखा बलिदान है।
4. तत्समप्रधान भाषा के प्रयोग से तर्पण के दृश्य में गंभीरता का भाव उत्पन्न हुआ है।


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - 'सरोज स्मृति' महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर -

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) -

प्रश्न 1 - 'सरोज स्मृति' कविता हिंदी साहित्य में किस रूप में प्रसिद्ध है ?

(क) राष्ट्रीय चेतना गीत

(ख) प्रथम शोकगीत

(ग) प्रकृति सौंदर्य गीत

(घ) दार्शनिक गीत

उत्तर - (ख) प्रथम शोकगीत

प्रश्न 2 - सरोज का विवाह पारंपरिक शादियों से किस प्रकार भिन्न था ?

(क) अत्यधिक फिजूलखर्ची के कारण

(ख) भव्य चमक-दमक के कारण

(ग) सादगी और मौन संगीत के कारण

(घ) अत्यधिक कोलाहल के कारण

उत्तर - (ग) सादगी और मौन संगीत के कारण

प्रश्न 3 - 'होंठों में बिजली फंसी स्पंद' पंक्ति में कौन सा अलंकार प्रयुक्त हुआ है ?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) उत्प्रेक्षा

(घ) अनुप्रास

उत्तर - (ग) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 4 - कवि निराला ने सरोज के विवाह में 'माता की कुल-शिक्षा' का दायित्व किसने निभाया था ?

(क) नानी ने

(ख) मौसी ने

(ग) स्वयं कवि निराला ने

(घ) मामी ने

उत्तर - (ग) स्वयं कवि निराला ने

प्रश्न 5 - कवि ने अपनी पुत्री सरोज की तुलना पौराणिक नाटक के किस पात्र से की है ?

(क) शकुंतला

(ख) सीता

(ग) देवसेना

(घ) कार्नेलिया

उत्तर - (क) शकुंतला


प्रश्न 6 - सरोज का लालन-पालन मुख्य रूप से कहाँ हुआ था ?

(क) उसके पैतृक गाँव में

(ख) ननिहाल में

(ग) ससुराल में

(घ) बनारस में

उत्तर - (ख) ननिहाल में

प्रश्न 7 - 'दुख ही जीवन की कथा रही' पंक्ति कवि के जीवन की किस स्थिति को दर्शाती है ?

(क) अत्यधिक प्रसन्नता को

(ख) निरंतर संघर्ष और संकटों को

(ग) सामाजिक सम्मान को

(घ) दार्शनिक आनंद को

उत्तर - (ख) निरंतर संघर्ष और संकटों को

प्रश्न 8 - 'शीत के-से शतदल' पद में कौन सा अलंकार दिखाई देता है ?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) मानवीकरण

(घ) यमक

उत्तर - (क) उपमा

प्रश्न 9 - कवि निराला अंत में अपनी दिवंगत पुत्री का तर्पण किस रूप में करते हैं ?

(क) केवल गंगाजल अर्पित करके

(ख) धन-दौलत दान करके

(ग) अपने संचित सत्कर्मों को अर्पित करके

(घ) विलाप करके

उत्तर - (ग) अपने संचित सत्कर्मों को अर्पित करके

प्रश्न 10 - 'सरोज स्मृति' कविता की मुख्य काव्य-भाषा कौन सी है ?

(क) ब्रजभाषा

(ख) अवधी

(ग) तत्समप्रधान खड़ी बोली हिंदी

(घ) मैथिली

उत्तर - (ग) तत्समप्रधान खड़ी बोली हिंदी


रिक्त स्थान पूर्ति कीजिए -

वाक्य 1 - सरोज स्मृति कविता छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ---------------- द्वारा रचित है।

उत्तर - 'निराला'

वाक्य 2 - विवाह के अवसर पर कलश का शुभ जल पड़ने पर सरोज के होंठों पर मंद ---------------- खेल रही थी।

उत्तर - मुस्कान

वाक्य 3 - कवि को सरोज का रूप अपने जीवन के वसंत की प्रथम ---------------- के समान प्रतीत होता है।

उत्तर - गीति

वाक्य 4 - सरोज के विवाह के समय संपूर्ण घर में पारंपरिक गीतों के स्थान पर एक सुंदर ---------------- व्याप्त था।

उत्तर - मौन

वाक्य 5 - कालिदास की शकुंतला को उसकी माता ने स्वयं छोड़ा था, परंतु सरोज की माता को ---------------- ने असमय छीन लिया था।

उत्तर - मृत्यु

वाक्य 6 - सरोज ने अपने जीवन के अंतिम समय में अपने ---------------- की गोद में ही महामरण को गले लगाया।

उत्तर - ननिहाल

वाक्य 7 - कवि अपने समस्त ---------------- का अर्पण करके अपनी पुत्री का तर्पण करना चाहते हैं।

उत्तर - सत्कर्मों


निराला सरोज स्मृति अतिलघु उत्तरात्मक प्रश्न -

प्रश्न 1 - 'सरोज स्मृति' कविता कवि निराला ने किसकी याद में लिखी है ?

उत्तर - यह कविता कवि निराला ने अपनी अठारह वर्षीय दिवंगत पुत्री सरोज की पवित्र स्मृति में लिखी है।

प्रश्न 2 - सरोज के विवाह को 'आमूल नवल' क्यों कहा गया है ? ( IMP )

उत्तर - इस विवाह में पारंपरिक तड़क-भड़क, शोर-शराबा और रिश्तेदारों की उपस्थिति न होने के कारण इसे 'आमूल नवल' कहा गया है।

प्रश्न 3 - 'मूर्ति-धीति' शब्द का काव्यात्मक अर्थ क्या है ?

उत्तर - मूर्ति-धीति का अर्थ है धैर्य और शांत स्वभाव की साक्षात मूरत होना।

प्रश्न 4 - कवि निराला को पुत्री के रूप में किसका सौंदर्य दिखाई देता है ?

उत्तर - कवि निराला को अपनी पुत्री सरोज के अनुपम रूप में अपनी स्वर्गीय पत्नी का सौंदर्य दिखाई देता है।

प्रश्न 5 - सरोज के विवाह में कौन-कौन से स्वजन उपस्थित थे ?

उत्तर - कवि द्वारा किसी को आमंत्रण न भेजे जाने के कारण इस विवाह में कोई भी सगे-संबंधी अथवा आत्मीय स्वजन उपस्थित नहीं थे।


प्रश्न 6 - 'पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची' पंक्ति से कवि का क्या तात्पर्य है ?

उत्तर - माता की अनुपस्थिति के कारण एक पिता होकर भी निराला जी ने स्वयं अपनी पुत्री के विवाह के उपरांत पुष्प-सेज सजाने का कर्तव्य निभाया था।

प्रश्न 7 - कवि निराला ने स्वयं को 'भाग्यहीन' क्यों कहा है ?

उत्तर - जीवनभर आर्थिक संकटों से जूझने और अपने सभी प्रियजनों को एक-एक करके खो देने के कारण कवि ने स्वयं को भाग्यहीन कहा है।

प्रश्न 8 - सरोज के सुख-दुख में हमेशा कौन व्यस्त रहते थे ?

उत्तर - सरोज के सुख-दुख में हमेशा उसके मामा, मामी और ननिहाल के अन्य सदस्य व्यस्त रहते थे।

प्रश्न 9 - 'शीत के-से शतदल' से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर - जिस प्रकार शीत ऋतु में पाला पड़ने से कमल के फूल नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार कवि के समस्त अच्छे कर्म भले ही नष्ट हो जाएँ।

प्रश्न 10 - कवि अपनी पुत्री का तर्पण किस प्रकार करता है ?

उत्तर - कवि अपने जीवन भर के समस्त संचित पुण्यों और सत्कर्मों की कमाई को अपनी पुत्री के चरणों में समर्पित करके उसका तर्पण करता है।


निराला सरोज स्मृति अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1 - सरोज के विवाह को 'आमूल नवल' क्यों कहा गया है ?

उत्तर - निराला जी ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह को 'आमूल नवल' यानी पूरी तरह से नया इसलिए कहा है क्योंकि यह विवाह समाज के पारंपरिक तौर-तरीकों से बिल्कुल अलग था।

विवाह में न तो कोई रिश्तेदार आए थे और न ही किसी को आमंत्रण पत्र भेजा गया था। शादी के समय गाए जाने वाले पारंपरिक गीत, रात-दिन का शोर-शराबा और अत्यधिक खर्च इस विवाह में बिल्कुल नहीं था।

यहाँ तक कि माता की अनुपस्थिति के कारण कवि ने स्वयं ही माता की कुल-शिक्षा और फूलों की सेज सजाने का दायित्व निभाया था। इसी सादगी और शांत वातावरण के कारण यह विवाह पूरी तरह नया था।

प्रश्न 2 - 'दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही' पंक्तियों के माध्यम से निराला का कैसा भाव व्यक्त हुआ है ?

उत्तर - इन पंक्तियों के माध्यम से निराला जी का असीम व्यक्तिगत दुख, आर्थिक संकट और एकाकीपन प्रकट हुआ है। निराला जी का संपूर्ण जीवन दुखों और कठिन परिस्थितियों की एक लंबी कहानी रहा है।

उन्होंने बहुत कम उम्र में ही अपनी पत्नी, पिता, चाचा और अंत में अपनी एकमात्र युवा पुत्री सरोज को भी खो दिया। समाज और प्रकाशकों ने भी विषम समय में उनका साथ नहीं दिया।

कवि के हृदय में इस बात की गहरी पीड़ा है कि वे जीवनभर संघर्ष करते रहे लेकिन अपनी लाडली बेटी को सुख-सुविधाएँ प्रदान नहीं कर सके।

प्रश्न 3 - कवि ने अपनी पुत्री सरोज की तुलना कालिदास की 'शकुंतला' से क्यों की है और दोनों में क्या अंतर बताया है ?

उत्तर - कवि ने सरोज की तुलना कालिदास के नाटक की पात्र 'शकुंतला' से इसलिए की है क्योंकि शकुंतला की तरह सरोज की माता भी उसके विवाह के अवसर पर उसके साथ नहीं थी और दोनों का ही लालन-पालन उनके ननिहाल में हुआ था।

कवि दोनों में यह अंतर बताते हैं कि शकुंतला की माता मेनका ने उसे स्वयं अपनी इच्छा से छोड़ा था, जबकि सरोज की माता को मृत्यु ने असमय छीन लिया था।

इसके अलावा शकुंतला का विवाह के बाद अपनी ससुराल जाते समय विलाप हुआ था, जबकि सरोज विवाह के कुछ दिन बाद स्वयं सानंद अपने ननिहाल लौट आई थी।


प्रश्न 4 - 'सरोज स्मृति' कविता का मूल प्रतिपाद्य या संदेश क्या है ?

उत्तर - यह कविता हिंदी साहित्य का पहला और सर्वश्रेष्ठ शोकगीत है जिसका मूल भाव एक पिता के गहरे शोक, अपनी दिवंगत पुत्री के प्रति वात्सल्य प्रेम और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति आक्रोश को व्यक्त किया गया है।

इस कविता के माध्यम से निराला जी ने अपनी अठारह वर्षीय पुत्री की अकाल मृत्यु पर गहरा विलाप किया है।

इसके साथ ही यह कविता मनुष्य को अपनी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य मार्ग पर डटे रहने और अपनी मर्यादा की रक्षा करने का संदेश देती है।

प्रश्न 5 सरोज के रूप में कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की छवि क्यों दिखाई देती है ?

उत्तर जब सरोज विवाह के समय नए वस्त्रों में सजी बैठी थी, तब उसकी आँखों की चमक और मंद मुस्कान देखकर कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद आ गई। सरोज का वह रूप हूबहू वैसा ही था जैसा निराला जी की पत्नी का उनके विवाह के समय था। कवि को लगा जैसे उनकी पत्नी ही सरोज के रूप में दुबारा उनके सामने खड़ी है।

क्या अब आप यह जान गए हैं की 'सरोज स्मृति' को एक शोक गीत क्यों माना जाता है ?
उत्तर - 'सरोज स्मृति' को हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ शोक गीत माना जाता है, क्योंकि इसकी रचना कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने अपनी 18 वर्षीया पुत्री 'सरोज' की असामयिक मृत्यु के गहरे दुःख में की थी।
इसे शोक गीत मानने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं -
इस कविता के केंद्र में अपनी इकलौती संतान को खोने की गहरी वेदना और करुण रस है। निराला जी ने इसमें एक बेबस पिता के रूप में अपनी आर्थिक तंगी और संघर्षों को बेबाकी से स्वीकार किया है।
वे स्वयं को कोसते हुए लिखते हैं - "धन्य! मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित न कर सका।" पूरी कविता में सरोज के बचपन, उसके अनोखे विवाह और उसकी अंतिम बीमारी की दुखद स्मृतियां बिखरी हुई हैं। अंत में, कवि अपने जीवन के समस्त सत्कर्मों को अपनी बेटी को अर्पित करते हुए उसका तर्पण करते हैं।
मूल बात यह है कि पुत्री के निधन पर उपजा यह व्यक्तिगत विलाप और कवि के जीवन की विवशता ही इस रचना को हिंदी का सबसे मार्मिक शोक गीत बनाती है।

आशा है इस पोस्ट के माध्यम से निराला की प्रसिद्ध कविता 'सरोज स्मृति' जो हिन्दी साहित्य का शोक गीत भी कहा जाता है पाठ जो NCERT पाठ्यक्रम आधारित है के समस्त पदों की सप्रसंग व्याख्या , परीक्ष उपयोगी प्रश्न उत्तर बहुत ही सरल भाषा में होने से आपकी तैयारी में अच्छा सहयोग मिला है । अपने सभी साथियों को अवश्य बताएं ताकि वे भी अपनी परीक्षा तैयारी में जुड़ सकें ।