इस पोस्ट में आज सूरदास जी का जीवन परिचय और उनके पदों की सप्रसंग व्याख्या के साथ प्रश्न उत्तर को सरल रूप में समझाने का प्रयास किया गया है ।
सूरदास -कवि परिचय
महाकवि सूरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के सबसे महान कृष्णभक्त कवि हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी बाल लीलाओं का गान करने में बिता दिया।
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| सूरदास के पद कक्षा 10 नोट्स |
सूरदास के पद सप्रसंग व्याख्या - सभी पद
पद 1 - उधौ, तुम हौ अति बड़भागी...
उधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौ लागी।
प्रीति-नदी में पाँउ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी॥
प्रसंग - यह पद हमारी पाठ्य पुस्तक के सूरदास के पद नाम के पाठ से लिया गया है। जब कृष्ण जी मथुरा चले जाते हैं और खुद न आकर अपने मित्र उद्धव को योग की बातें सिखाने के लिए गोपियों के पास भेजते हैं, तब गोपियां उद्धव पर ताना मारती हैं।
सप्रसंग व्याख्या - गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव, तुम तो बड़े भाग्यशाली हो क्योंकि तुम प्रेम के बंधन से एकदम दूर हो और तुम्हारा मन किसी के प्यार में डूबा ही नहीं है। तुम कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से वैसे ही अछूते रहे जैसे कमल का पत्ता हमेशा पानी के अंदर रहता है पर उस पर पानी का एक दाग भी नहीं लगता।
दूसरा उदाहरण देकर कहती हैं कि जैसे तेल लगी मटकी को पानी में डुबाने पर भी उस पर पानी की एक बूंद नहीं रुकती, वैसे ही तुम पर कृष्ण के प्रेम का कोई असर नहीं हुआ। तुमने आज तक प्रेम की नदी में अपना पैर तक नहीं डाला और न ही तुम्हारी आंखों में किसी के लिए प्यार जगा है।
सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां बोलती हैं कि हम तो भोली-भाली ग्रामीण महिलाएं हैं, जो कृष्ण के प्रेम में वैसे ही चिपक गई हैं जैसे चींटियां गुड़ से चिपक जाती हैं।
विशेष -
1. इस पद में ब्रजभाषा का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है।
2. गोपियों ने उद्धव पर बहुत तीखा व्यंग्य किया है।
3. कमल के पत्ते और तेल की मटकी के उदाहरण से बात को बहुत सरल रूप में समझाया गया है।
4. भाषा बहुत सीधी और गाने योग्य है।
पद 2 - मन की मन ही माँझ रही...
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहत हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
सूरदास अब धीर धरहिं क्यौ, मरजादा न लही॥
प्रसंग - इस पद में गोपियां उद्धव से अपने मन का दुःख कह रही हैं कि कृष्ण जी के न आने से उनके मन की बात मन में ही रह गई है।
सप्रसंग व्याख्या - गोपियां कहती हैं कि हमारे मन की बात तो मन के अंदर ही रह गई। हे उद्धव, अब तुम ही बताओ कि हम अपने दिल की बात किससे जाकर कहें क्योंकि प्रेम की बातें हर किसी के सामने कही भी नहीं जा सकतीं। इतने समय से हम कृष्ण जी के आने के समय को अपना सहारा मानकर तन और मन से इस जुदाई के दुःख को झेल रही थीं
। हमें उम्मीद थी कि वे आएंगे तो हमारा दुःख दूर हो जाएगा। लेकिन अब तुम्हारे इस योग के संदेश को सुन-सुनकर हम जुदाई की आग में और ज्यादा जलने लगी हैं। हम इस दुःख के समय में अपनी रक्षा के लिए जिधर भी आवाज लगाना चाहती थीं, उधर से ही योग की यह तेज धारा बहकर आ गई है।
सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां बोल रही हैं कि अब हम धीरज क्यों रखें जब कृष्ण जी ने ही अपनी मर्यादा का पालन नहीं किया और हमें धोखा दिया है।
विशेष -
1. गोपियों के मन का दुःख और उनकी लाचारी बहुत ही सुंदर रूप में दिखाई गई है।
2. सुनि-सुनि शब्द में एक ही शब्द दो बार आने से भाषा सुंदर लगती है।
3. शुद्ध ब्रजभाषा का प्रयोग देखने को मिलता है।
4. कृष्ण के न आने से गोपियों की निराशा साफ झलकती है।
पद 3 - हमारे हारिल की लकरी...
हमारे हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बच्चन नंद-नंदन उर, यह करि पकरि जकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ सूरतहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
प्रसंग - इस पद में गोपियां उद्धव की योग वाली बातों को पूरी तरह मना करते हुए कृष्ण जी के प्रति अपने अटूट प्रेम को दिखा रही हैं।
सप्रसंग व्याख्या - गोपियां कहती हैं कि हमारे लिए हरि यानी कृष्ण जी तो हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे हैं। जैसे हारिल पक्षी अपने पैरों में दबी लकड़ी को किसी भी हाल में नहीं छोड़ता, वैसे ही हमने भी मन, काम और वचन से नंद के बेटे कृष्ण को अपने दिल में कसकर पकड़ रखा है।
हम जागते हुए, सोते हुए, सपने में और दिन-रात बस कान्ह-कान्ह ही रटती रहती हैं। हे उद्धव, तुम्हारी यह योग की बातें सुनते ही हमें ऐसा लगता है जैसे मुंह में कोई कड़वी ककड़ी आ गई हो। तुम तो हमारे लिए एक ऐसी बीमारी लेकर आए हो जिसके बारे में न तो हमने पहले कभी देखा, न सुना और न कभी जाना।
सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव से साफ कह दिया कि यह योग की सीख तुम उन लोगों को जाकर दो जिनके मन चंचल हैं और घूमते रहते हैं, हमारा मन तो कृष्ण के प्रेम में पहले से ही एक जगह टिका हुआ है।
विशेष -
1. हमारे हरि हारिल की लकरी पंक्ति में ह अक्षर बार-बार आने से बहुत ही सुंदर अनुप्रास अलंकार बना है।
2. कृष्ण के प्रति गोपियों के सच्चे और अटूट प्रेम को दिखाया गया है।
3. योग के संदेश की तुलना कड़वी ककड़ी और बीमारी से बहुत सुंदर ढंग से की गई है।
4. हारिल पक्षी की लकड़ी का उदाहरण बहुत ही सटीक और सुंदर है।
पद 4 - हरी हैं राजनीति पढ़ि आए...
हरी हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहले ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बड़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनौ मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौ अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राजधरम तौ यहै सूर, जो प्रजा न जाहिं सताए॥
प्रसंग - इस आखिरी पद में गोपियां कृष्ण जी पर ताना मारती हैं कि बड़े आदमी बनने के बाद वे राजनीति सीख गए हैं और अब वे न्याय की जगह उनके साथ अन्याय कर रहे हैं।
सप्रसंग व्याख्या - गोपियां आपस में बात करते हुए कहती हैं कि सखी, अब तो कृष्ण जी राजनीति पढ़ आए हैं। इस उद्धव ने जो बात कही है, क्या वह तुम्हारी समझ में आई ? क्या तुम्हें कृष्ण का कोई समाचार मिला ? एक तो वे पहले से ही बहुत चालाक थे और अब उन्होंने बड़े-बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं।
उनकी बुद्धि कितनी बढ़ गई है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हमारे लिए योग का संदेश भेजा है। हे उद्धव, पुराने जमाने के लोग बहुत भले होते थे जो दूसरों के भले के लिए दौड़े चले आते थे। हम तो बस इतना चाहती हैं कि कृष्ण जी जाते समय हमारा जो दिल चुपके से चुराकर ले गए थे, वह हमें वापस मिल जाए।
वे कृष्ण दूसरों को तो गलत काम करने से रोकते हैं, फिर वे खुद हमारे साथ ऐसा गलत काम क्यों कर रहे हैं ? सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के अनुसार सच्चा राजा तो वही होता है जो अपनी प्रजा को कभी न सताए और उनके दुखों को दूर करे।
विशेष -
1. राजनीति शब्द के सहारे कृष्ण की चालाकी पर बहुत बड़ा व्यंग्य किया गया है।2. पद के अंत में एक अच्छे राजा के कर्तव्य यानी राजधर्म की बहुत सुंदर बात कही गई है।
3. गोपियों की समझदारी और उनकी स्पष्टता देखने लायक है।
4. ब्रजभाषा का रूप बहुत ही निखरा हुआ और सरल है।
सूरदास के पद प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1 - सूरदास जी के अनुसार सच्चा राजधर्म क्या है ?
क - प्रजा का धन छीनना
ख - प्रजा को सताना
ग - प्रजा को कभी न सताए जाना
घ - प्रजा पर शासन करना
उत्तर - ग - प्रजा को कभी न सताए जाना
प्रश्न 2 - गोपियों ने उद्धव के संदेश को किसके समान बताया है ?
क - मीठे आम के समान
ख - कड़वी ककड़ी के समान
ग - ठंडे पानी के समान
घ - कड़वे नीम के समान
उत्तर - ख - कड़वी ककड़ी के समान
प्रश्न 3 - गोपियों के लिए कृष्ण जी किसके समान हैं ?
क - नीम की लकड़ी जैसे
ख - हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे
ग - चंदन की लकड़ी जैसे
घ - पीपल की लकड़ी जैसे
उत्तर - ख - हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे
प्रश्न 4 - सूरदास जी की सबसे लोकप्रिय रचना कौन सी है ?
क - साहित्य लहरी
ख - सूरसारावली
ग - सूरसागर
घ - भ्रमरगीत
उत्तर - ग - सूरसागर
अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1 - गोपियों ने अपने प्रेम की तुलना किससे की है ?
उत्तर - गोपियों ने अपने प्रेम की तुलना गुड़ से लिपटी हुई चींटियों से की है।
प्रश्न 2 - उद्धव गोपियों के पास क्या संदेश लेकर आए थे ?
उत्तर - उद्धव गोपियों के पास कृष्ण जी को भूलकर योग साधना करने का संदेश लेकर आए थे।
प्रश्न 3 - 'मधुकर' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
उत्तर - इस पाठ में 'मधुकर' शब्द का प्रयोग उद्धव के लिए किया गया है।
प्रश्न 4 - गोपियों के अनुसार कृष्ण ने अब कौन सा शास्त्र पढ़ लिया है ?
उत्तर - गोपियों के अनुसार कृष्ण ने अब राजनीति का शास्त्र पढ़ लिया है।
प्रश्न 5 - सूरदास जी किस रस के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं ?
उत्तर - सूरदास जी वात्सल्य और शृंगार रस के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 - गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या ताना छिपा है ?
उत्तर - गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह गहरा ताना छिपा है कि उद्धव सच में बहुत अभागे हैं। वे प्रेम के सागर कृष्ण जी के पास रहते हैं फिर भी उनके दिल में थोड़ा सा भी प्यार नहीं जगा। वे प्रेम के आनंद और उसके दुःख से एकदम अनजान हैं, इसलिए वे भाग्यशाली नहीं बल्कि बहुत अभागे हैं।
प्रश्न 2 - उद्धव के बर्ताव की तुलना किस-किस से की गई है ?
उत्तर - उद्धव के बर्ताव की तुलना दो चीजों से की गई है -
कमल के उस पत्ते से जो हमेशा पानी के अंदर रहता है पर उस पर पानी का कोई दाग नहीं लगता।
तेल लगी हुई उस मटकी से जिसे पानी में डुबाने पर भी पानी की एक भी बूंद उसके ऊपर नहीं रुकती।
प्रश्न 3 - गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के सहारे उद्धव को ताने दिए हैं ?
उत्तर - गोपियों ने उद्धव को ताने देने के लिए कमल के पत्ते, तेल की मटकी और कड़वी ककड़ी के उदाहरण दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उद्धव प्रेम की नदी के पास रहकर भी उसमें पैर नहीं डुबो सके। इसके साथ ही उन्होंने कृष्ण को राजनीति पढ़ा हुआ राजा और उद्धव को दूसरों के काम के लिए दौड़ने वाला दूत कहा है।
प्रश्न 4 - उद्धव के योग संदेश ने गोपियों के दुःख को और ज्यादा कैसे बढ़ा दिया ?
उत्तर - गोपियां दिन-रात कृष्ण जी के लौटने का रास्ता देख रही थीं। उन्होंने उम्मीद की थी कि कृष्ण आएंगे तो उनका दुःख दूर हो जाएगा। लेकिन जब कृष्ण ने खुद न आकर उद्धव के हाथ योग का संदेश भेज दिया कि वे कृष्ण को भूल जाएं, तो इस बात ने उनकी उम्मीदों को तोड़ दिया। इस बात से उनका दुःख और ज्यादा बढ़ गया।
प्रश्न 5 - 'मरजादा न लही' के सहारे कौन सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है ?
उत्तर - इसके सहारे प्रेम की मर्यादा न रहने की बात की जा रही है। प्रेम की यह मर्यादा होती है कि प्रेम के बदले हमेशा प्रेम ही दिया जाए। गोपियों ने कृष्ण से सच्चा प्रेम किया, लेकिन कृष्ण ने बदले में योग का संदेश भेजकर गोपियों के साथ धोखा किया। उन्होंने राजा और प्रेमी दोनों का धरम तोड़ दिया।
प्रश्न 6 - कृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम को गोपियों ने कैसे दिखाया है ?
उत्तर - गोपियों ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को हारिल पक्षी की लकड़ी जैसा बताया है। उन्होंने कहा कि जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को हमेशा पकड़े रहता है, वैसे ही उन्होंने कृष्ण को दिल में बसाया है। वे सोते, जागते और सपने में भी बस कृष्ण का नाम रटती रहती हैं। उन्होंने अपने प्रेम को गुड़ से लिपटी चींटियों जैसा भी बताया है।
प्रश्न 7 - 'हारिल की लकरी' वाले पद में गोपियों के मन का क्या भाव दिखाई देता है ?
उत्तर - इस पद में गोपियों का कृष्ण के प्रति अटूट और सच्चा प्रेम दिखाई देता है। गोपियां कृष्ण के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। उनके मन में कृष्ण के अलावा किसी और के लिए कोई जगह नहीं है। यहां गोपियों का भोलापन और उनकी गहरी लगन साफ नजर आती है।
प्रश्न 8 - 'हरी हैं राजनीति पढ़ि आए' वाले पद में क्या संदेश मिलता है ?
उत्तर - इस पद में गोपियों का तीखा ताना और समझदारी दिखाई देती है। वे अपने प्रिय कृष्ण को राजा बनने के बाद चालाक बताती हैं। सीधे बात न कहकर उद्धव के बहाने अपनी बात कहना और अंत में राजा को उसका सच्चा धरम याद दिलाना गोपियों की हिम्मत को दिखाता है।
प्रश्न 8 - 'उधौ, तुम हौ अति बड़भागी' वाले पद में उद्धव के बारे में क्या बात कही गई है ?
उत्तर - इस पद में गोपियां सामने वाले की तारीफ करते हुए भी उसकी सबसे बड़ी कमी को सामने लाती हैं। कमल के पत्ते और तेल की मटकी का उदाहरण देकर वे बताती हैं कि उद्धव के दिल में कोई भावना नहीं है। इसमें ऊपर से तारीफ और अंदर से उनके अभागे होने का भाव छिपा है।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 - गोपियों के अनुसार सच्चे राजा का क्या काम है ?
उत्तर - गोपियों के अनुसार सच्चे राजा का काम यह होता है कि वह अपनी प्रजा को कभी न सताए। राजा का फर्ज अपनी प्रजा की रक्षा करना, उनके दुखों को दूर करना और उन्हें हर तरह के कष्टों से बचाना होता है।
प्रश्न 2 - गोपियों को उद्धव की बातें कड़वी ककड़ी जैसी क्यों लगती हैं ?
उत्तर - गोपियों के दिल में बस कृष्ण जी का मीठा और सच्चा प्रेम बसा हुआ है। योग की कठिन बातें करना और कृष्ण को भूल जाना उनके लिए एकदम असंभव है। इसलिए जैसे ही वे उद्धव के मुंह से योग की बातें सुनती हैं, उनका मन खराब हो जाता है और वे बातें उन्हें कड़वी ककड़ी जैसी लगती हैं।
प्रश्न 3 - 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए' बात का क्या मतलब है ?
उत्तर - इस बात का मतलब यह है कि कृष्ण जी अब मथुरा के राजा बन गए हैं और वहां जाकर वे बहुत चालाक हो गए हैं। वे खुद सामने न आकर उद्धव के सहारे चाल चल रहे हैं ताकि गोपियां उन्हें भूल जाएं। गोपियों को लगता है कि कृष्ण अब उनके साथ छल कर रहे हैं।
प्रश्न 4 - गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा किन लोगों को देने के लिए कहा है और क्यों ?
उत्तर - गोपियों ने उद्धव से कहा कि वे योग की सीख उन लोगों को जाकर दें जिनके मन चंचल हैं और एक जगह नहीं टिकते। गोपियों का मन तो कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से स्थिर है, इसलिए उन्हें किसी भी तरह के योग या भटकाव की कोई जरूरत नहीं है।
