आज इस पोस्ट में कक्षा 11अनिवार्य हिन्दी के पाठ कबीर के पद में कबीर का परिचय , सप्रसंग व्याख्या और परीक्षा उपयोगी महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर के बारे में बिल्कुल सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया गया है ।
कबीर परिचय और रचना परिचय -
- कबीर दास जी का जन्म सन 1398 में काशी के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था जो वर्तमान में वाराणसी , उत्तरप्रदेश में स्थित है ।
- कबीर दास जी हिंदी साहित्य के भक्ति काल के महान संत और कवि थे।
- वे भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा की ज्ञानाश्रयी (संत ) शाखा के कवि थे ।
- उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नाम के एक जुलाहा दंपती ने किया था।
- कबीर दास जी पढ़े-लिखे नहीं थे।
- उन्होंने जो कुछ भी सीखा वह साधुओं की संगति और अपने अनुभवों से सीखा है।
- कबीर दास जी की भाषा बहुत सरल और आम बोलचाल की भाषा है जिस जिसमें हिंदी, अवधी, पंजाबी और राजस्थानी शब्दों का मेल है।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' नाम दिया है।
- बाबू श्यामसुंदर दास ने उनकी भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी' कहा है ।
- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को 'भाषा का डिक्टेटर' (तानाशाह) कहा है ।
- उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक नाम की पुस्तक में मिलता है जिसके तीन भाग हैं साखी, सबद और रमैनी।
- कबीर दास जी समाज में फैले अंधविश्वास, जाति-पांति और धार्मिक दिखावे के सख्त खिलाफ थे। उनका निधन सन 1518 में मगहर में हुआ था।
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| कक्षा 11 हिन्दी अनिवार्य कबीर के पद पाठ सप्रसंग व्याख्या प्रश्न उत्तर |
कक्षा 11 अनिवार्य हिन्दी कबीर पद 1 की सप्रसंग व्याख्या -
हम तौ एक एक करि जानां।
दोई कहैं तिनहीं कौं दोजख जिन नाहिंन पहिचानां।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समानां।
एकै खाक गढ़े सब भांड़े एकै कोहरा सानां।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।
माया देखि के जगत लुभाना काहे रे नर गरबाना।
निर्भय भया कछू नहीं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।
प्रसंग -
यह पद हमारी कक्षा 11की पाठ्यपुस्तक में कवि कबीर दास जी द्वारा रचित कबीर के पद शीर्षक पाठ से लिया गया है । इस पद में कबीर दास जी ने बताया है कि भगवान एक ही है और वह हर जगह मौजूद है।
व्याख्या -
कबीर दास जी कहते हैं कि हमने तो जान लिया है कि ईश्वर एक ही है। जो लोग ईश्वर को अलग-अलग बताते हैं और कहते हैं कि नरक और स्वर्ग के देवता अलग हैं, वे असल में ईश्वर को पहचानते ही नहीं हैं। वे अज्ञानी हैं।
कबीर दास जी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि पूरे संसार में एक जैसी ही हवा चलती है, एक जैसा ही पानी हर जगह बहता है और एक ही मिट्टी से कुम्हार अलग-अलग तरह के बर्तन बनाता है। बर्तन भले ही अलग आकार के हों, लेकिन मिट्टी तो एक ही होती है।
ठीक उसी तरह जैसे बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है लेकिन उस लकड़ी के अंदर छिपी हुई आग को नहीं काट सकता। वैसे ही इंसान का शरीर तो नष्ट हो जाता है लेकिन उसके अंदर रहने वाली आत्मा कभी नहीं मरती क्योंकि वह भगवान का रूप है।
हे भगवान, इस संसार के सभी जीवों के अंदर आप ही अलग-अलग रूपों में बसे हुए हैं। यह संसार माया के जाल में फंसा हुआ है और लोग इस झूठी माया पर घमंड करते हैं। कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग इस माया के धोखे से दूर हो जाते हैं, वे पूरी तरह निडर हो जाते हैं। उन्हें किसी बात का डर नहीं रहता।
विशेष -
भाषा बहुत सरल और आम बोलचाल की है।
ईश्वर को एक और सर्वव्यापी बताया गया है।
कुम्हार और बढ़ई के उदाहरण से बात को बहुत आसान तरीके से समझाया गया है।
कबीर पद 2 की सप्रसंग व्याख्या -
संतो देखत जग बौरानॉ।
सांच कहौं तो मारन धावै झूठे जग पतियाna।
नेमी देखा धर्मी देखा प्रात करै असनाना।
आतम मारि पषानहि पूजै उनमें कछू नहीं ग्याना।
बहुतक देखा पीर औलिया पढ़ै कितैब कुराना।
कै मुरीद तदबीर बतावै उनमें उहै जो ग्याना।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे मन में बहुत गुमाना।
पीपर पाथर पूजन लागे तीरथ गरब भुलाना।
टोपी पहिरे माला पहिरे छाप तिलक अनुमाना।
साखी सबदहि गावत भूले आतम खबरि न जाना।
हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए मरम न काहू जाना।
घर घर मंत्र देत फिरत हैं महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिष्य सब बूड़े अंत काल पछिताना।
कहै कबीर सुनो हो संतो ई सब भरम भुलाना।
केतिक कहौं कहा नहिं मानै सहजै सहज समाना।
प्रसंग -
यह पद हमारी कक्षा 11की पाठ्यपुस्तक में कवि कबीर दास जी द्वारा रचित कबीर के पद शीर्षक पाठ से लिया गया है । इस पद में कबीर दास जी ने समाज के झूठे नियमों, पाखंड और दिखावा करने वाले लोगों पर कड़ा प्रहार किया है।
व्याख्या -
कबीर दास जी सज्जन लोगों को समझाते हुए कहते हैं कि देखो यह संसार पागल हो गया है। अगर इस संसार के लोगों को सच्ची बात बताओ तो वे मारने दौड़ते हैं और अगर झूठी बातें कहो तो वे उस पर पूरा भरोसा कर लेते हैं।
कबीर दास जी कहते हैं कि मैंने बहुत से ऐसे नियम मानने वाले और सुबह उठकर नहाने वाले लोग देखे हैं जो अपनी आत्मा को तो मार देते हैं और पत्थरों की पूजा करते हैं। उनके अंदर कोई सच्चा ज्ञान नहीं होता।
मैंने बहुत से ऐसे पीर और औलिया भी देखे हैं जो धार्मिक पुस्तकेंपढ़ते हैं और अपने शिष्यों को तरह-तरह के उपाय बताते हैं। उन्हें खुद भगवान के बारे में कुछ पता नहीं होता। कुछ लोग आसन लगाकर अहंकार में बैठ जाते हैं और मन में बहुत घमंड भर लेते हैं।
वे पीपल के पेड़ और मूर्तियों की पूजा करते हैं और तीर्थ यात्रा पर जाकर भूल जाते हैं कि भगवान कहाँ हैं। वे सिर पर टोपी पहनते हैं, गले में माला पहनते हैं और माथे पर तिलक लगाकर घूमते हैं।
वे साखी और शब्द गाना भूल गए हैं और अपनी आत्मा के सच को नहीं जानते। हिंदू कहते हैं कि उन्हें राम प्यारे हैं और मुसलमान कहते हैं कि उन्हें रहीम प्यारे हैं। इस तरह दोनों आपस में लड़-लड़ कर मर जाते हैं लेकिन कोई भी ईश्वर के सच्चे रूप को नहीं समझ पाता है ।
कबीर दास जी कहते हैं कि ऐसे झूठे गुरु घर-घर जाकर मंत्र देते फिरते हैं और अपनी महिमा गाते हैं। ऐसे गुरु और उनके शिष्य अंत में पछताते हैं और डूब जाते हैं।
कबीर दास जी कहते हैं कि हे संतों, ये सब लोग माया के जाल में भूल गए हैं। इन्हें कितना भी समझाओ, ये नहीं मानते। सच तो यह है कि भगवान बहुत सहजता से और सीधे सच्चे मन से ही मिलते हैं।
विशेष -
समाज में फैले अंधविश्वास और धार्मिक दिखावे पर करारी चोट की गई है।
हिंदू और मुसलमान दोनों के पाखंड को सामने रखा गया है।
भाषा मन को छू लेने वाली और बहुत आसान है।
कक्षा 11 हिन्दी अनिवार्य कबीर के पद सम्पूर्ण प्रश्न उत्तर -
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न और उत्तर -
प्रश्न 1 - कबीर दास जी की नजर में ईश्वर का क्या रूप है ?
उत्तर - कबीर दास जी की नजर में ईश्वर एक ही है। वह संसार के कण-कण में, हवा में, पानी में और हर जीव के अंदर आत्मा के रूप में बसा हुआ है। उसे अलग-अलग रूपों में बांटना गलत है।
प्रश्न 2 - कबीर दास जी ने संसार को पागल क्यों कहा है ?
उत्तर - कबीर दास जी ने संसार को पागल इसलिए कहा है क्योंकि जब लोगों को सच बताया जाता है तो वे गुस्सा होते हैं और मारने दौड़ते हैं। लेकिन जब उनसे झूठ बोला जाता है तो वे उस पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं।
प्रश्न 3 - कबीर दास जी ने झूठे गुरुओं की क्या पहचान बताई है ?
उत्तर - कबीर दास जी के अनुसार झूठे गुरु माथे पर तिलक लगाते हैं, टोपी पहनते हैं और माला पहनकर घूमते हैं। वे घर-घर जाकर मंत्र देते हैं और घमंड में डूबे रहते हैं। उन्हें खुद सच्चा ज्ञान नहीं होता और वे अपने शिष्यों को भी ले डूबते हैं।
कबीर के पद अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर -
प्रश्न 1 - कुम्हार और बढ़ई के उदाहरण से कबीर दास जी क्या समझाना चाहते हैं ?
उत्तर - कुम्हार के उदाहरण से कबीर दास जी समझाते हैं कि जैसे एक ही मिट्टी से अलग-अलग बर्तन बनते हैं, वैसे ही एक ही ईश्वर ने हम सबको बनाया है। बढ़ई के उदाहरण से वे समझाते हैं कि शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा हमेशा अमर रहती है।
प्रश्न 2 - कबीर दास जी के अनुसार लोग आपस में क्यों लड़ते हैं ?
उत्तर - लोग धर्म के सच्चे रूप को नहीं जानते। हिंदू राम को बड़ा बताते हैं और मुसलमान रहीम को बड़ा बताते हैं। वे बाहरी दिखावे में उलझ जाते हैं और इसी अज्ञानता के कारण आपस में लड़ते हैं।
प्रश्न 3 - सहजै सहज समाना पंक्ति का क्या अर्थ है ?
उत्तर - इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान को पाने के लिए किसी कठिन दिखावे या पाखंड की जरूरत नहीं है। भगवान तो बहुत सीधे-सादे और सच्चे मन की भक्ति से ही आसानी से मिल जाते हैं।
बहू विकल्प वाले प्रश्न उत्तर -
प्रश्न 1 - कबीर दास जी के अनुसार ईश्वर का वास्तविक रूप क्या है ?
क) ईश्वर अनेक हैं
ख) ईश्वर एक ही है
ग) ईश्वर केवल मूर्तियों में है
घ) ईश्वर केवल किताबों में है
उत्तर - (ख) ईश्वर एक ही है ।
प्रश्न 2 - कबीर ने कुम्हार का उदाहरण देकर क्या समझाने का प्रयास किया है ?
क) बर्तन बनाने की कला
ख) मिट्टी की महत्ता
ग) सभी मनुष्यों का एक ही ईश्वर द्वारा निर्माण
घ) समाज का विभाजन
उत्तर - (ग) सभी मनुष्यों का एक ही ईश्वर द्वारा निर्माण ।
प्रश्न 3 - जगत किस चीज को देखकर उसके जाल में फंस जाता है और घमंड करता है ?
क) ज्ञान को
ख) भक्ति को
ग) गुरु को
घ) माया को
उत्तर - ( घ ) माया को ।
प्रश्न 4 - कबीर दास जी ने संसार को पागल क्यों कहा है ?
क) क्योंकि संसार सच बोलने वाले को मारने दौड़ता है
ख) क्योंकि संसार बहुत समझदार है
ग) क्योंकि संसार पत्थरों को नहीं पूजता
घ) क्योंकि संसार में शांति है
उत्तर - ( क ) क्योंकि संसार सच बोलने वाले को मारने दौड़ता है ।
प्रश्न 5 - कबीर के अनुसार सच्चे गुरु की शरण में न जाने वाले शिष्यों को अंत में क्या करना पड़ता है ?
क) खुश होना पड़ता है
ख) पछताना पड़ता है
ग) ज्ञान मिलता है
घ) मुक्ति मिलती है
उत्तर - (ख) पछताना पड़ता है ।
भाव सौंदर्य से संबन्धित प्रश्न उत्तर -
प्रश्न 1 - जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई पंक्ति का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - इस पंक्ति का भाव यह है कि जैसे बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है लेकिन उसके अंदर छिपी आग को नष्ट नहीं कर सकता, वैसे ही मृत्यु मनुष्य के शरीर को तो नष्ट कर सकती है लेकिन उसके भीतर रहने वाली अमर आत्मा को कभी नष्ट नहीं कर सकती। यहाँ आत्मा की अमरता को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है।
प्रश्न 2 - आतम मारि पषानहि पूजै उनमें कछू नहीं ग्याना पंक्ति का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - इस पंक्ति के माध्यम से कबीर दास जी ने उन लोगों पर गहरी चोट की है जो अपने अंदर छिपे सच्चे ज्ञान और आत्मा की आवाज को तो दबा देते हैं और पत्थरों की मूर्तियों को पूजने में लगे रहते हैं। इसका मुख्य भाव यह है कि बाहरी पत्थरों को पूजने से पहले इंसान को अपने भीतर के भगवान को पहचानना चाहिए।
प्रश्न 3 - हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहिमाना आपस में दोउ लरि लरि मूए मरम न काहू जाना पंक्ति का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - इन पंक्तियों का भाव समाज में धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों को दिखाना है। कबीर कहते हैं कि हिंदू राम को श्रेष्ठ बताते हैं और मुसलमान रहीम को, और इसी बात पर दोनों आपस में लड़कर मर जाते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि राम और रहीम दोनों एक ही ईश्वर के नाम हैं। यहाँ धार्मिक एकता का बहुत मजबूत संदेश दिया गया है।
प्रश्न 4 - गुरु के सहित सिष्य सब बूड़े अंत काल पछिताना पंक्ति का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - इस पंक्ति का भाव यह है कि जो गुरु खुद अज्ञानी होते हैं और बाहरी दिखावे में डूबे रहते हैं, वे खुद तो डूबते ही हैं और अपने साथ अपने शिष्यों के जीवन को भी बर्बाद कर देते हैं। ऐसे लोगों को जीवन के आखिरी समय में केवल पछतावा ही हाथ लगता है। यहाँ झूठे गुरुओं से बचकर रहने की चेतावनी दी गई है।
प्रश्न 5 - केतिक कहौं कहा नहिं मानै सहजै सहज समाना पंक्ति का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - इस पंक्ति का भाव बहुत ही शांत और सच्चा है। कबीर कहते हैं कि मैंने संसार के लोगों को कितना भी समझाया पर वे मेरी बात नहीं मानते। सच तो यह है कि उस परमेश्वर को पाने के लिए किसी कठिन रास्ते या दिखावे की जरूरत नहीं है, वह तो सच्चे और साफ मन से सहज रूप से ही मिल जाता है।
