जयशंकर प्रसाद देवसेना का गीत कार्नेलिया का गीत । सप्रसंग व्याख्या महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स

 आज इस पोस्ट में  कवि जयशंकर प्रसाद का परिचय , देवसेना का गीत और कार्नेलिया का गीत की सप्रसंग व्याख्या के साथ प्रश्न उत्तर भी सरल भाषा में समझाने का प्रयास  किया  गया है । 

NCERT आधारित यह पाठ कक्षा 12 हिन्दी साहित्य के सबसे प्रमुख पाठों में से एक है । 

जयशंकर प्रसाद का कवि परिचय

1. जयशंकर प्रसाद का जन्म सन 1889 में वाराणसी के एक प्रसिद्ध व्यवसायी परिवार में हुआ था। उनके परिवार को सुँघनी साहु के नाम से जाना जाता था। उन्होंने अपनी मेहनत से संस्कृत, हिंदी, फारसी और बंगाली भाषाओं का गहरा ज्ञान प्राप्त किया।

2. जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में प्राचीन भारतीय संस्कृति, देशप्रेम और मानवीय भावनाओं का बहुत ही कोमल तालमेल मिलता है।

3. कामायनी जयशंकर प्रसाद का सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसके अतिरिक्त आँसू, लहर, झरना उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। उन्होंने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और ध्रुवस्वामिनी जैसे कई शानदार ऐतिहासिक नाटक भी लिखे हैं।

4. प्रसाद जी भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के साथ देश - प्रेम की भावना से जुड़े हुए थे । इनके काव्य में राष्ट्रीय जागरण का सुंदर स्वरूप देखने को मिलता है । आध्यात्मिकता , रहस्यवाद की भावना भी इनके काव्य में दिखाई देती है ।

4. लगातार संघर्षों को झेलने के कारण सन 1937 में बहुत कम उम्र में ही इस महान लेखक का निधन हो गया।


जयशंकर प्रसाद कवि परिचय
जयशंकर प्रसाद  महत्त्वपूर्ण  प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स


देवसेना का गीत काव्य खंड की सप्रसंग व्याख्या -

यह गीत जयशंकर प्रसाद जी के प्रसिद्ध नाटक स्कंदगुप्त से लिया गया है। देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है जो स्कंदगुप्त से सच्चा प्रेम करती है, परंतु स्कंदगुप्त किसी और को चाहता है। जब देवसेना बूढ़ी हो जाती है और अपने जीवन के आखिरी मोड़ पर होती है, तब वह अपने दुखों को याद करके यह विदाई गीत गाती है।

पद 1 व्याख्या

अहा वेदना मिली विदाई !

मैंने भ्रमवश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे संध्या के श्रमकण,

आँसू से गिरते थे प्रतिक्षण,

मेरी यात्रा पर लेती थी,

नीरवता अनंत अँगड़ाई।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग-2 के काव्य खंड के पहले पाठ देवसेना का गीत से लिया गया है। इसके रचयिता महाकवि जयशंकर प्रसाद हैं। इस पद में देवसेना अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपने बीते हुए दिनों के दर्द और टूटे हुए प्रेम को याद कर भावुक हो रही है।

व्याख्या - देवसेना बहुत ही दुखी मन से कहती है कि मुझे अपने जीवन के इस आखिरी समय में विदाई के रूप में केवल दर्द और पीड़ा ही मिली है।

मैंने पूरी जिंदगी स्कंदगुप्त के प्यार के धोखे में रहकर अपने दिल में जो भी कोमल भावनाएँ और इच्छाएँ इकट्ठी की थीं, आज मैंने उन सभी उम्मीदों को भीख की तरह पूरी तरह लुटा दिया है। मेरी जिंदगी की यह शाम दुखों से भरी हुई है।

जैसे कोई थका हुआ मजदूर पसीने से तर हो जाता है, वैसे ही मेरे जीवन के संघर्षों के कारण मेरी आँखों से हर पल आँसू गिर रहे हैं। मेरी इस अकेली और उदास जीवन यात्रा में चारों तरफ केवल सन्नाटा और खामोशी ही फैली हुई है, मानो वह खामोशी मुझे अकेला देखकर मजे से अँगड़ाई ले रही हो।

विशेष -


1. छलछल शब्द में एक ही बात दो बार आने से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।


2. सन्नाटे या खामोशी को अँगड़ाई लेते हुए दिखाया गया है, इसलिए यहाँ बहुत सुंदर मानवीकरण अलंकार है।


3. भाषा अत्यंत कोमल है और इसमें बिछड़ने के दर्द यानी वियोग श्रृंगार रस को बहुत अच्छे से दिखाया गया है।


4. तत्सम शब्दावली के साथ करुण रस के प्रयोग की प्रधानता है।


पद 2 व्याख्या

श्रमित स्वप्न की मधु-माया में,

गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने,

यह विहाग की तान उठाई ?

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,

मेरी आशा आह ! बावली,

तूने खो दी सकल कमाई ।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग-2 के काव्य खंड के पहले पाठ देवसेना का गीत से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। जब स्कंदगुप्त जीवन के अंतिम समय में देवसेना के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर आता है, तब देवसेना के मन में जो व्याकुलता होती है, यहाँ उसी का वर्णन है।

व्याख्या - देवसेना कहती है कि जब कोई थका हुआ मुसाफिर किसी घने जंगल में पेड़ की ठंडी छाया के नीचे मीठे सपनों के जाल में सो रहा हो, और उसकी आधी खुली आँखों के बीच कोई अचानक आधी रात को गाया जाने वाला विहाग राग का संगीत छेड़ दे, तो उसे कैसा लगेगा ? ठीक ऐसा ही आज मुझे महसूस हो रहा है।

जब मैं अपने पुराने दुखों को भुलाकर शांत बैठना चाहती हूँ, तब स्कंदगुप्त ने आकर मेरे मन के सोए हुए प्यार को फिर से क्यों जगा दिया है ? देवसेना कहती है कि जब मैं जवान थी, तब इस संसार के लोगों की लालची और प्यासी नजरें मुझ पर ही टिकी थीं।

मैं खुद को उन सब से बचाए घूम रही थी, लेकिन आज जीवन के इस आखिरी मोड़ पर आकर मैंने अपने जीवन भर की सबसे बड़ी कमाई यानी अपने सच्चे प्यार और आत्मसम्मान को हमेशा के लिए खो दिया है।

विशेष -


1. मधु-माया में म अक्षर की आवृत्ति बार-बार होने से अनुप्रास अलंकार है।


2. कवि ने थके हुए मुसाफिर के उदाहरण से देवसेना के मन की उदासी को बहुत ही सुंदर तरीके से समझाया है।


3. पूरे पद में सुंदर बिंब विधान है और इसमें एक मधुर संगीतात्मकता का गुण मिलता है।


पद 3 व्याख्या

लौटा लो यह अपनी थाती,

मेरी करुणा हाहा खाती,

विश्व न सँभलेगी यह मुझसे,

इससे मन की लाज गँवाई।

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,

प्रलय चल रहा अपने पथ पर,

मैंने दुर्बल पद-बल पर,

उससे हारी-होड़ लगाई।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग-2 के काव्य खंड के पहले पाठ देवसेना का गीत से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। यह इस गीत का आखिरी हिस्सा है जिसमें देवसेना संसार को संबोधित करते हुए अपने प्रेम को सदा के लिए विदा करती है।

व्याख्या - देवसेना इस पूरे संसार को संबोधित करते हुए कहती है कि हे दुनिया के लोगो ! तुम स्कंदगुप्त के इस प्यार रूपी अमानत या धरोहर को मुझसे वापस ले लो। अब मेरा दिल दुखों के मारे हाहाकार कर रहा है।

यह प्यार अब इस उम्र में मुझसे नहीं सँभलेगा, क्योंकि इसी प्यार के चक्कर में पड़कर मैंने समाज में अपने मन की लाज और आत्मसम्मान को भी दाँव पर लगा दिया था। देवसेना आगे कहती है कि मेरे इस जीवन रूपी रथ पर सवार होकर विनाश अपने रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मेरे पैर बहुत कमजोर हैं और मेरी हार पूरी तरह निश्चित है, फिर भी मैं उस शक्तिशाली विनाश से एक ऐसी बाजी लगा रही हूँ जिसमें मुझे हारना ही है। वह हारकर भी हिम्मत और साहस नहीं छोड़ती।

विशेष -


1. जीवन-रथ में जीवन को रथ का रूप दिया गया है, इसलिए यहाँ बहुत सुंदर रूपक अलंकार है।


2. लौटा लो और हारी-होड़ में अक्षरों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।


3. काव्य पंक्तियों में लयबद्धता है और अंत अत्यंत गरिमापूर्ण विचारों के साथ होता है।


कार्नेलिया का गीत सप्रसंग व्याख्या

यह गीत प्रसाद जी के प्रसिद्ध नाटक चंद्रगुप्त से लिया गया है। सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की बेटी कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे बैठकर भारत की सुंदर प्रकृति को देखकर इस देश की और यहाँ के लोगों की जमकर तारीफ करती है।

पद 1 व्याख्या - अरुण यह मधुमय देश हमारा। -------।

अरुण यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।

छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग-2 के काव्य खंड के पहले पाठ कार्नेलिया का गीत से लिया गया है। इसके रचयिता महाकवि जयशंकर प्रसाद हैं। इस पद में कार्नेलिया भारत की सुंदर सुबह और यहाँ की महिमा का गान कर रही है।

व्याख्या - कार्नेलिया कहती है कि हमारा यह भारत देश सुबह की लालिमा से भरा हुआ, बहुत ही मीठा, प्यारा और आनंदमयी देश है। यह एक ऐसा महान देश है जहाँ दूर-दराज से आने वाले अनजान मुसाफिरों और दिशाओं के छोर को भी रहने के लिए एक सच्चा सहारा और ठिकाना मिल जाता है।

यहाँ सुबह के समय जब तालाबों में खिले हुए कमलों के पत्तों पर सूरज की चमकदार किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो पेड़ों की ऊँची चोटियाँ खुशी से झूम-झूमकर नाच रही हों।

यहाँ की हरी-भरी धरती को देखकर ऐसा लगता है मानो किसी ने पूरी प्रकृति पर सुख और समृद्धि का पवित्र सिंदूर बिखेर दिया हो।

विशेष -


1. इस पद में भारत देश की महानता और मेहमानों का आश्रय देने वाली संस्कृति को दिखाकर राष्ट्रीय गौरव को दर्शाया गया है।


2. सूरज की किरणों और पेड़ों का बहुत सुंदर दृश्य हमारे सामने उभरता है, जिससे यहाँ दृश्य बिंब का सुंदर प्रयोग हुआ है।


3. भाषा तत्सम प्रधान, संस्कृतनिष्ठ और अत्यंत सुंदर देशप्रेम की भावना से भरी हुई है।


पद 2 - लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।--------।


लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ करुणा जल।

लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।

हेम-कुम्भ ले ऊषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग-2 के काव्य खंड के पहले पाठ कार्नेलिया का गीत से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इस पद में कार्नेलिया ने भारत के जीव-जंतुओं, यहाँ के लोगों की दयालुता और भोर के समय की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है।

व्याख्या - कार्नेलिया कहती है कि छोटे-छोटे इंद्रधनुष जैसे रंग-बिरंगे पंख फैलाकर और चंदन के पहाड़ों से आने वाली ठंडी हवा के सहारे, छोटे-छोटे पक्षी जिस दिशा की ओर मुँह करके उड़ते हैं, वे वास्तव में इस भारत देश को ही अपना प्यारा घोंसला समझते हैं।

यहाँ के लोग इतने दयालु और मददगार हैं कि दूसरों के दुखों को देखकर उनकी आँखों से करुणा के आँसू इस तरह बहने लगते हैं मानो बादल पानी बरसा रहे हों। सुदूर देशों और विशाल महासागरों से आने वाली तेज लहरें भी भारत के किनारों से टकराकर शांत हो जाती हैं, मानो उन्हें यहाँ आकर आश्रय मिल गया हो।

सुबह के समय जब रात भर जागने के कारण आसमान के तारे नींद में ऊँघ रहे होते हैं, तब सुबह रूपी सुंदर स्त्री मानो अपने साथ सोने का घड़ा लेकर आती है और इस भारत भूमि पर सुख-समृद्धि बिखेर देती है।

विशेष -


1. सुबह या ऊषा को सोने का घड़ा लेकर सुख बिखेरते हुए दिखाया गया है, इसलिए यहाँ बहुत ही सुंदर मानवीकरण अलंकार है।


2. लघु सुरधनु और मलय समीर में अक्षरों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।


3.आँखों से बहने वाले आँसू की तुलना बादलों से की गयी है, इसलिए यहाँ बहुत ही सुंदर उपमा अलंकार है।

जयशंकर प्रसाद (देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत) प्रश्न उत्तर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न -

प्रश्न 1 'देवसेना का गीत' जयशंकर प्रसाद के किस नाटक से लिया गया है ?

(अ) चन्द्रगुप्त

(ब) स्कन्दगुप्त

(स) ध्रुवस्वामिनी

(द) अजातशत्रु

उत्तर (ब) स्कन्दगुप्त

प्रश्न 2 देवसेना किससे सच्चा प्रेम करती थी, जिसने अंतिम समय में उससे विवाह का प्रस्ताव रखा ?

(अ) बन्धुवर्मा

(ब) चन्द्रगुप्त

(स) स्कन्दगुप्त

(द) पर्णदत्त

उत्तर (स) स्कन्दगुप्त

प्रश्न 3 "अरुण यह मधुमेह देश हमारा" गीत किसके द्वारा गाया गया है ?

(अ) देवसेना

(ब) कार्नेलिया

(स) विजया

(द) अलका

उत्तर (ब) कार्नेलिया

प्रश्न 4 कार्नेलिया कौन थी ?

(अ) बन्धुवर्मा की बहन

(ब) सम्राट चन्द्रगुप्त की पुत्री

(स) सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री

(द) मालवा की राजकुमारी

उत्तर (स) सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री

प्रश्न 5 "मधुकरी की भीख लुटाई" पंक्ति में 'मधुकरी' का क्या अर्थ है ?

(अ) शहद

(ब) भिक्षा या पकी हुई पूरियाँ

(स) जीवन की इच्छाएँ और सुख-सपने

(द) भ्रमर का समूह

उत्तर (स) जीवन की इच्छाएँ और सुख-सपने

प्रश्न 6 निम्नलिखित में से कौन-सी काव्य कृति महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य है ?

(अ) झरना

(ब) लहर

(स) आँसू

(द) कामायनी

उत्तर (द) कामायनी


अति लघुत्तरात्मक प्रश्न -

प्रश्न 7 देवसेना के भाई का क्या नाम था तथा वह कहाँ के राजा थे ?

उत्तर देवसेना के भाई का नाम बन्धुवर्मा था और वे मालवा के राजा थे।

प्रश्न 8 देवसेना अपने जीवन के अंतिम दौर में क्या कार्य करती थी ?

उत्तर जीवन के अंतिम मोड़ पर देवसेना वृद्ध पर्णदत्त के साथ आश्रम में रहकर भीख माँगने और देश सेवा का कार्य करती थी।

प्रश्न 9 कार्नेलिया को भारत की कौन-सी विशेषता सबसे ज्यादा आकर्षित करती है ?

उत्तर कार्नेलिया को भारत की प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ के लोगों की दयालुता और अनजान लोगों को भी आश्रय देने की भावना आकर्षित करती है।

प्रश्न 10 "चढ़कर मेरे जीवन रथ पर, प्रलय चल रहा अपने पथ पर" पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?

उत्तर इस पंक्ति में जीवन को रथ बताने के कारण रूपक अलंकार और प्रलय को चलते हुए दिखाने से मानवीकरण अलंकार है।

प्रश्न 11 कार्नेलिया का गीत जयशंकर प्रसाद के किस प्रसिद्ध नाटक का अंश है ?

उत्तर कार्नेलिया का गीत उनके प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक चन्द्रगुप्त से लिया गया है।


लघुत्तरात्मक प्रश्न -

प्रश्न 12 देवसेना ने अपने जीवन की अंतिम पूँजी यानी 'मधुकरी की भीख' क्यों लुटा दी ?


उत्तर देवसेना ने अपना पूरा जीवन स्कन्दगुप्त के सच्चे प्रेम की चाहत में बिता दिया। उसने अपने जीवन की कोमल भावनाओं, इच्छाओं और सुखद सपनों को संजोकर रखा था। लेकिन अंतिम समय में जब स्कन्दगुप्त विवाह का प्रस्ताव लेकर आया, तब तक देवसेना टूट चुकी थी।

उसने स्कन्दगुप्त के प्रेम को ठुकरा दिया और अपनी बची-खुची यादों और इच्छाओं को भीख की तरह लुटाकर सांसारिक मोह-माया से मुक्ति पा ली।


प्रश्न 13 "जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा" पंक्ति का क्या आशय है ?


उत्तर इस पंक्ति के माध्यम से कार्नेलिया ने भारत देश की महानता और यहाँ की उदार संस्कृति का वर्णन किया है। क्षितिज वह काल्पनिक स्थान है जहाँ धरती और आसमान मिलते हुए दिखाई देते हैं। कार्नेलिया कहती है कि भारत इतना दयालु देश है कि यहाँ दूर-दराज से आए अनजान और बेसहारा विदेशी लोगों को भी अपनापन, आश्रय और सहारा मिल जाता है।


प्रश्न 14 देवसेना की निराशा और वेदना के मुख्य कारण क्या थे ?


उत्तर देवसेना की वेदना के दो मुख्य कारण थे। पहला कारण यह था कि हूणों के आक्रमण के कारण उसका पूरा परिवार और भाई बन्धुवर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए, जिससे वह बिलकुल अकेली हो गई। दूसरा कारण यह था कि वह स्कन्दगुप्त से सच्चा प्रेम करती थी, लेकिन स्कन्दगुप्त मालवा के धनकुबेर की बेटी विजया के सपने देख रहा था। इस एकतरफा प्रेम की हार ने उसे गहरी निराशा से भर दिया।


दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न -

प्रश्न 15 'कार्नेलिया का गीत' कविता के आधार पर भारत की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक गौरव का वर्णन कीजिए।

उत्तर 'कार्नेलिया का गीत' में जयशंकर प्रसाद ने भारत की अलौकिक छवि को उकेरा है। कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे बैठकर भारत के सूर्योदय का अद्भुत नजारा देखती है। यहाँ की सुबह मिठास और उत्साह से भरी होती है। सूर्य की लाल किरणें जब पेड़ों की शाखाओं पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे चारों ओर कुमकुम बिखरा हो। यहाँ के लोग दयालु हैं।

वे दूसरों के दुखों को देखकर भावुक हो जाते हैं, मानो उनकी आँखों से करुणा के आँसू बह रहे हों। यहाँ तक कि पक्षी भी भारत को अपना सुरक्षित घोंसला मानकर इसी ओर पंख फैलाकर उड़ते हैं। यह देश हर किसी को शांति और शरण देने वाला है।

प्रश्न 16 छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय संक्षेप में दीजिए।


उत्तर जयशंकर प्रसाद छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महान स्तंभ हैं। उनका जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी रचनाओं में भारत के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव चित्रण किया है। प्रसाद जी कवि होने के साथ-साथ एक महान नाटककार, कहानीकार और उपन्यासकार भी थे।

उनकी भाषा शुद्ध, साहित्यिक, तत्सम प्रधान खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कोमलता और मधुरता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मानव मन की सूक्ष्म भावनाओं, राष्ट्रप्रेम और वैराग्य को बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है।


कविता की पंक्तियों पर आधारित भाव सौंदर्य के प्रश्न -

प्रश्न 17 "आह! वेदना मिली विदाई! मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरी की भीख लुटाई।" पंक्तियों का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर इन पंक्तियों का भाव यह है कि देवसेना अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अत्यधिक दुखी है। वह कहती है कि उसने जीवन भर स्कन्दगुप्त के प्रेम की चाहत में जो सुखद सपने और कोमल भावनाएँ संजोकर रखी थीं, वे सब मात्र एक भ्रम साबित हुईं।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसे गहरी निराशा और पीड़ा ही विदाई के रूप में मिली है। वह अपने जीवन की उस अमूल्य संचित पूँजी को अब एक विकल भिक्षा की तरह दान कर देना चाहती है ताकि वह सांसारिक मोह से मुक्त हो सके। यहाँ देवसेना का आत्मसम्मान और वैराग्य भाव प्रकट हुआ है।

प्रश्न 18 "श्रमित स्वप्न की मधु-माया में, गहन-विपिन की तरु-छाया में, पथिक उनींदी श्रुति में किसने, यह विहाग की तान उठाई ?" पंक्तियों का भाव सौंदर्य लिखिए।


उत्तर इन पंक्तियों में देवसेना के मन की व्याकुलता का अत्यंत मार्मिक भाव व्यक्त हुआ है। देवसेना कहती है कि जब कोई थका हुआ राही घने जंगल में किसी पेड़ की छाया के नीचे मीठे सपनों में खोया हुआ सो रहा हो, और अचानक कोई उसे जगाने के लिए अर्धरात्रि में गाया जाने वाला 'विहाग' राग सुना दे, तो उसे कितनी परेशानी होगी।

ठीक इसी प्रकार जब देवसेना अपनी पुरानी यादों को भुलाकर जीवन के अंतिम क्षणों में शांति पाना चाहती है, तब स्कन्दगुप्त का विवाह का प्रस्ताव उसे उसी विहाग राग की तरह अशांत कर देता है।

प्रश्न 19 "लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे, उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।" पंक्तियों का भाव सौंदर्य बताइए।


उत्तर इन पंक्तियों में भारत देश की सर्वव्यापक उदारता और शांति का भाव छिपा है। कार्नेलिया कहती है कि रंग-बिरंगे छोटे इंद्रधनुष जैसे पंखों को फैलाकर और मलय पर्वत से आने वाली ठंडी हवा के सहारे सुंदर पक्षी जिस दिशा की ओर मुँह करके उड़ रहे हैं, वही उनका प्यारा घोंसला अर्थात भारत देश है।

इसका गहरा भाव यह है कि भारत केवल मनुष्यों को ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों और विदेशी शरणार्थियों को भी अपनी छत्रछाया में सुरक्षित आश्रय और सुख प्रदान करता है।

प्रश्न 20 "बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल, लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।" पंक्तियों में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।


उत्तर इन पंक्तियों का मुख्य भाव भारत के लोगों के भीतर कूट-कूट कर भरी करुणा और दयालुता को दर्शाना है। कार्नेलिया कहती है कि भारत के लोगों की आँखें दूसरों के दुखों को देखकर बादलों की तरह करुणा के आँसू बरसाने लगती हैं।

यहाँ के लोग पराए दर्द को देखकर व्याकुल हो उठते हैं। साथ ही, दूर विशाल समुद्र से उठने वाली अशांत लहरें भी जिस प्रकार भारत के तट से टकराकर शांत हो जाती हैं, उसी प्रकार संसार के कोने-कोने से आए दुखी और अशांत लोगों को भारत की भूमि पर आकर परम शांति प्राप्त होती है।

प्रश्न 21 "हेम-कुंभ ले उषा सवेरे भरती ढुलकाती सुख मेरे, मदिर ऊँघते रहते जब जगकर रजनी भर तारा।" पंक्तियों का भाव सौंदर्य प्रकट कीजिए।


उत्तर इन पंक्तियों का भाव सौंदर्य प्रकृति के अनूठे रूप और मानवीय चेतना के मिलन को दर्शाता है। कवि ने सुबह के समय का मानवीकरण करते हुए बताया है कि उषा रूपी सुंदरी जब सूर्य रूपी सोने के घड़े को लेकर आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह भारतवासियों के जीवन में सुख-समृद्धि बिखेर रही हो।

रात भर जागने के बाद तारे जब थककर नींद में ऊँघने लगते हैं, तब भारत की यह पावन और अलौकिक सुबह हर जीव में एक नई ऊर्जा, उमंग और चेतना का संचार करती है।

अन्य उपयोगी प्रश्न उत्तर -

प्रश्न 1 - कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
उत्तर - देवसेना के गीत में आशा को बावली यानी पागल इसलिए कहा गया है क्योंकि उम्मीद इंसान को अंधा बना देती है और वह सच को देखना ही नहीं चाहता। देवसेना पूरी जिंदगी स्कंदगुप्त के प्यार की झूठी उम्मीद में बैठी रही, जबकि वह जानती थी कि स्कंदगुप्त किसी और को चाहता है।
इस नासमझ उम्मीद के चक्कर में उसने अपने जीवन के सबसे खूबसूरत दिन, अपनी खुशियाँ और सब कुछ दांव पर लगा दिया।अंत में जब बुढ़ापा आया, तब उसे समझ आया कि वह जिस सपने के पीछे भाग रही थी, वह कभी पूरा होना ही नहीं था।
यह आशा इंसान को उस चीज़ के पीछे भगाती है जो उसे कभी नहीं मिल सकती और आखिर में सिर्फ और सिर्फ पछतावा देती है, इसी वजह से कवि ने इसे बावली कहा है।
प्रश्न 2 - 'देवसेना का गीत' का मूल भाव / केंद्रीय भाव क्या है ?
उत्तर - यह गीत जीवन के अंतिम समय में मिलने वाली निराशा, दुख और एकतरफा प्रेम के पछतावे को दिखाता है। देवसेना जीवनभर स्कंदगुप्त के प्यार की झूठी उम्मीद में भटकती रही और अपने परिवार को खोने के बाद भी संघर्ष करती रही।
आखिरी समय में जब स्कंदगुप्त विवाह का प्रस्ताव लाता है, तब तक देवसेना बहुत थक चुकी होती है और वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए उसे ठुकरा देती है। यह गीत मनुष्य के जीवन की उस हार और विरह की वेदना को प्रकट करता है जहाँ वह सब कुछ खोकर भी अपनी गरिमा बनाए रखता है।
प्रश्न 3 - 'कार्निलिया का गीत' का केंद्रीय भाव / मूल भाव क्या है ?
उत्तर - यह गीत भारत देश की प्राकृतिक सुंदरता, गौरवशाली संस्कृति और यहाँ के लोगों की दयालुता का एक सुंदर गुणगान है। विदेशी कन्या कार्निलिया भारत के अनुपम सौंदर्य को देखकर इस देश को अपना सच्चा घर मान लेती है।
वह बताती है कि भारत एक ऐसा प्यारा देश है जहाँ अनजान मुसाफिरों और भटकते पक्षियों को भी अपनेपन का सहारा मिलता है। यहाँ के लोग दूसरों के दुखों को देखकर भावुक हो जाते हैं, इसलिए यह गीत भारत की महानता और सबको गले लगाने की हमारी पुरानी परंपरा को सामने रखता है।



कवि जयशंकर प्रसाद की कविता 'देवसेना का गीत' और 'कार्नेलिया का गीत' से संबंधित इस पाठ को बहुत ही आसान भाषा में तैयार किया गया है। इस पाठ के नोट्स अब यहीं पूर्ण होते हैं आशा है आपको जानकारी अच्छी लगी होगी। अपने साथियों के साथ भी शेयर करना न भूलें।