इस पोस्ट में आज हम NCERT, CBSE, RBSE बोर्ड कक्षा 12 परीक्षा की अच्छी तैयारी करने के लिए अनिवार्य हिंदी के पाठ गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना 'कवितावली / लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप' का कवि परिचय, सप्रसंग व्याख्या, काव्य सौंदर्य और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर की जानकारी नोट्स के रूप में जानेंगे।
इस पोस्ट में सम्पूर्ण जानकारी बहुत ही सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया गया है ताकि आप अपनी तैयारी को मजबूत कर सकें -
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पाठ परिचय -
प्यारे विद्यार्थियों, आज हम गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचनाओं का अध्ययन करेंगे। एक शिक्षक के रूप में मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह पाठ दो अलग-अलग रंगों को समेटे हुए है। पहले भाग 'कवितावली' में तुलसीदास ने अपने समय के समाज की भयानक गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी का ऐसा सजीव चित्र खींचा है जिसे देखकर पता चलता है कि वे अपने समय के यथार्थ को कितनी गहराई से समझते थे ।
दूसरे भाग 'लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप' में भाई के वियोग में तड़पते भगवान राम के मानवीय रूप को दिखाया गया है। यह अंश हमें अपनों के प्रति अगाध प्रेम और पारिवारिक संवेदनाओं की सीख देता है। आइए, इस पाठ को बहुत ही सरल शब्दों में समझने की कोशिश करते हैं।
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| तुलसीदास कवितावली और लक्ष्मण मूर्छा राम का विलाप कक्षा 12 । सम्पूर्ण नोट्स |
तुलसीदास - कवि परिचय
जन्म और शिक्षा - रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म वर्ष 1532 में राजापुर, बांदा उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका बचपन घोर कष्टों और अभावों में बीता, लेकिन गुरु नरहरिदास की कृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला। वे हिंदी साहित्य के सबसे महान लोकप्रिय कवि माने जाते हैं और उनका पूरा जीवन रामभक्ति के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहा।
प्रमुख रचनाएँ - उनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी रचना 'रामचरितमानस' है जो रामभक्ति का सबसे बड़ा ग्रंथ मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'कवितावली', 'गीतावली', 'विनयपत्रिका', 'दोहावली', 'कृष्णगीतावली' और 'बरवै रामायण' जैसी महान कृतियों की रचना की है।
साहित्यिक विशेषताएँ - तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं में अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर अपनी अनूठी पकड़ दिखाई है। उनकी कविताओं में समन्वय की भावना, आदर्श मानवीय मूल्य और समाज सुधार का संदेश मिलता है। वे अपनी बात को बिना किसी बनावटी दिखावे के बिल्कुल साफ-सुथरी और लोक-कल्याणकारी हिंदी में लिखते थे। उनका निधन साल 1623 में काशी में हुआ।
तुलसीदास - कवितावली की सप्रसंग व्याख्या
गोस्वामी तुलसीदास की रचना 'कवितावली' की सप्रसंग व्याख्या और भाव सौंदर्य को बहुत ही आसान शब्दों में समझेंगे। कविता के मुताबिक, उस समय समाज में हर तरफ भुखमरी और गरीबी फैली हुई थी और लोग पेट भरने के लिए परेशान थे।
यहाँ बहुत ही सीधे-सरल तरीके से बताया गया है कि कैसे तुलसीदास जी इस गरीबी और दुख को दूर करने का एकमात्र रास्ता श्री राम की कृपा को मानते हैं।
भाग 1
किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।
पेट ही को पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन गन अहन अखेटकी।
प्रसंग - यह पंक्तियाँ हमारी हिंदी की किताब से ली गई हैं जिसके कवि तुलसीदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने अपने समय के समाज में फैली भुखमरी और पेट की आग को बुझाने के लिए इंसानों द्वारा किए जाने वाले कार्यों का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि कहते हैं कि समाज में मज़दूर, किसान परिवार, व्यापारी, भिखारी, राजाओं की प्रशंसा करने वाले भाट, नौकर, चंचल खेल दिखाने वाले नट, चोर, दूत और जादूगर ये सभी लोग केवल और केवल अपने पेट की आग को बुझाने के लिए ही दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।
पेट भरने के लिए ही लोग पढ़ाई करते हैं, अलग-अलग कलाएँ सीखते हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर पहाड़ों पर चढ़ते हैं और शिकारी पेट की खातिर ही दिनभर घने जंगलों में शिकार की तलाश में भटकते रहते हैं।
विशेष और भाव सौंदर्य -
- भाषा अत्यंत सरल, प्रभावशाली और साहित्यिक ब्रजभाषा है।
- किसान-कुल, चोर चार और गहन गन पदों में अनुप्रास अलंकार की बहुत सुंदर छटा देखने को मिलती है।
- तुलसीदास ने समाज की आर्थिक बदहाली और भूख की समस्या का बहुत ही व्यावहारिक और वास्तविक चित्र खींचा है।
- यह रचना कवित्त छंद में लिखी गई है जिससे पंक्तियों में एक सुंदर संगीतात्मक लय दिखाई देती है।
भाग 2 - ऊंचे-नीचे करम करम, धरम-अधरम करि, ------------------- ।
ऊंचे-नीचे करम करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
तुलसी बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागि तें बड़ी है आगि पेट की।
प्रसंग - इन पंक्तियों में कवि ने पेट की आग को दुनिया की सबसे भयानक आग बताते हुए इसे केवल ईश्वर की कृपा से ही शांत होने की बात कही है।
व्याख्या - कवि कहते हैं कि भूख के मारे लोग अच्छे-बुरे कर्म कर रहे हैं और वे धर्म-अधर्म का विचार किए बिना गलत रास्ते पर चल रहे हैं। पेट भरने के लिए लोग इस कदर मजबूर हैं कि वे अपने सगे बेटा-बेटी तक को बेचने के लिए तैयार हो जाते हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि पेट की यह आग समुद्र की आग यानी बड़वाग्नि से भी बहुत बड़ी और भयानक है। इस भयानक आग को केवल भगवान श्रीराम रूपी दयालु बादल ही अपनी कृपा की वर्षा से बुझा सकते हैं, इंसानी प्रयास यहाँ छोटे पड़ जाते हैं।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 राम घनस्याम पद में बहुत ही सुंदर रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है जो भगवान राम को सुखद बादल के रूप में दिखाता है।
2 आगि बड़वागि तें बड़ी है आगि पेट की पंक्ति में व्यतिरेक अलंकार का सौंदर्य देखने को मिलता है।
3 समाज की बेबसी और मानवीय मूल्यों के पतन का बहुत ही मार्मिक और झकझोरने वाला चित्रण हुआ है।
4 पूरी पंक्तियों में शांत और करुण रस का एक बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रवाह दिखाई देता है।
भाग 3 - खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,----------------------।
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को न बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी ?
प्रसंग - इन पंक्तियों में कवि ने बेरोज़गारी और मंदी की मार झेल रहे समाज की विकट स्थिति का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि कहते हैं कि अकाल और मंदी के कारण किसान के पास खेती करने का कोई साधन नहीं बचा है। भिखारी को कोई भीख या दान-दक्षिणा देने वाला नहीं है। व्यापारी के पास करने के लिए कोई व्यापार नहीं है और नौकरों को काम देने के लिए कोई नौकरी नहीं बची है।
अपनी आजीविका छिन जाने के कारण सभी लोग दुखी और गहरी चिंता में डूबे हुए हैं। वे सब बेबसी में एक-दूसरे से केवल यही पूछते रहते हैं कि अब हम कहाँ जाएँ और अपना पेट पालने के लिए क्या उपाय करें।
विशेष और भाव सौंदर्य -
- किसान को, भिखारी को न भीख और बनिक को न बनिज पदों में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
- समाज में फैली बेरोज़गारी और आर्थिक संकट की बेबसी का बहुत ही यथार्थ चित्र आँखों के सामने उभरता है।
- कहैं एक एकन सों कहाँ जाई का करी पंक्ति से समाज की सामूहिक निराशा और छटपटाहट साफ दिखाई देती है।
- यह कवित्त छंद की सुंदर रचना है जिसकी भाषा पूरी तरह से स्वाभाविक और प्रवाहमयी है।
भाग 4 - धूत कहौ, अवधूत कहौ, राजपूतौ कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। ------------ ।
धूत कहौ, अवधूत कहौ, राजपूतौ कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचै सो कहै ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत में सोइबो, लैबो को एकु न दैबो को दोऊ।
प्रसंग - इस प्रसिद्ध सवैया में तुलसीदास ने समाज के जाति-पाति के बंधनों और तानों को दरकिनार करते हुए अपनी अनन्य रामभक्ति को प्रकट किया है।
व्याख्या - कवि दुनिया के रूढ़िवादी लोगों को चुनौती देते हुए कहते हैं कि तुम चाहे मुझे धूर्त कहो, संन्यासी कहो, राजा कहो या जुलाहा कहो, मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।
मुझे अपनी जाति की कोई चिंता नहीं है क्योंकि मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे की शादी नहीं करनी है और न ही किसी की जाति बिगाड़ने का मुझे कोई शौक है। तुलसीदास कहते हैं कि मैं तो पूरी दुनिया में केवल भगवान श्रीराम का प्रसिद्ध गुलाम हूँ।
जिसके मन में जो आए, वह मेरे बारे में कह सकता है। मैं तो मांगकर खा लूँगा और मस्जिद यानी किसी भी पवित्र एकांत स्थान पर आराम से सो जाऊँगा, मुझे दुनिया से न कुछ लेना है और न ही कुछ देना है।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 लैबो को एकु न दैबो को दोऊ पद में प्रसिद्ध लोक मुहावरे का बहुत ही सटीक प्रयोग हुआ है जो कवि की बेफिक्री को दिखाता है।
2 काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब पंक्ति से तत्कालीन समाज की रूढ़िवादी और संकीर्ण सोच पर करारा प्रहार किया गया है।
3 यह रचना सवैया छंद में है जो अपनी गेयता और सुंदर लय के लिए बहुत लोकप्रिय है।
4 कवि का स्वाभिमान, फक्कड़पन और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण इस भाग का मुख्य भाव सौंदर्य है।
तुलसीदास - लक्ष्मण मूर्छा राम का विलाप सप्रसंग व्याख्या -
गोस्वामी तुलसीदास के प्रसंग 'लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप' की सप्रसंग व्याख्या और भाव सौंदर्य को बहुत ही आसान शब्दों में समझेंगे। इस प्रसंग के मुताबिक, युद्ध में लक्ष्मण के बेहोश होने पर भगवान राम एक आम इंसान की तरह फूट-फूटकर रोने लगते हैं।
यहाँ बहुत ही सीधे-सरल तरीके से बताया गया है कि कैसे श्री राम का यह विलाप उनके और लक्ष्मण के बीच के गहरे भाईचारे और सच्चे प्रेम को दिखाता है।
भाग 5 - तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहऊँ नाथ तुरंत। ------।
तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहऊँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।
प्रसंग - यह अंश रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इन पंक्तियों में संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे हनुमान जी का भरत जी से मिलने के बाद दोबारा लंका की तरफ प्रस्थान करने का वर्णन है।
व्याख्या - हनुमान जी भरत जी से कहते हैं कि हे प्रभु, मैं आपके महान प्रताप और शक्ति को अपने हृदय में रखकर तुरंत लंका पहुँच जाऊँगा, आप चिंता न करें। ऐसा कहकर और भरत जी से आज्ञा पाकर, हनुमान जी उनके चरणों की वंदना करके तुरंत वहाँ से चल देते हैं।
रास्ते में उड़ते हुए पवनपुत्र हनुमान जी भरत जी की भुजाओं के बल, उनके ऊंचे चरित्र, उनके अच्छे गुणों और भगवान राम के चरणों के प्रति उनके अपार प्रेम की मन ही मन बार-बार बहुत प्रशंसा करते हुए जा रहे हैं।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 यह अंश दोहा छंद में लिखा गया है जिसकी भाषा अत्यंत मधुर और साहित्यिक अवधी है।
2 पुनि पुनि पद का एक साथ प्रयोग होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार की सुंदर योजना है।
3 प्रभु पद प्रीति और पवनकुमार पदों में अनुप्रास अलंकार का बहुत ही मनोहारी सौंदर्य देखने को मिलता है।
4 हनुमान जी के मन में भरत जी के प्रति आदर और भाई-भाई के आदर्श प्रेम को बहुत सुंदर ढंग से उभारा गया है।
भाग 6 - उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी------- ।
उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।
प्रसंग - इन पंक्तियों में लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर आधी रात बीत जाने के बाद भगवान राम के व्याकुल होने और आम इंसान की तरह विलाप करने का वर्णन है।
व्याख्या - वहाँ लंका के युद्ध मैदान में भगवान राम मूर्छित पड़े लक्ष्मण को देखकर एक साधारण मनुष्य की तरह व्याकुल होकर विलाप करने लगते हैं। राम कहते हैं कि आधी रात बीत चुकी है लेकिन अभी तक हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर नहीं आए हैं।
ऐसा कहकर राम ने तड़पते हुए अपने छोटे भाई लक्ष्मण को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। राम रोते हुए कहते हैं कि हे भाई, तुम तो मुझे कभी भी दुखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव तो मेरे प्रति हमेशा से ही बहुत कोमल और दयालु रहा है, आज तुम चुप क्यों हो।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1. यह रचना चौपाई छंद में है जो अवधी भाषा की मिठास को बहुत अच्छे से प्रकट करती है।
2. बोले बचन मनुज अनुसारी पंक्ति से भगवान राम के सर्वशक्तिमान रूप के पीछे छिपे उनके अत्यंत कोमल मानवीय रूप को दिखाया गया है।
3. पूरी पंक्तियों में करुण रस की प्रधानता है जो पाठकों के मन को भीतर तक झकझोर देती है।
4. अनुज उर और बोले बचन में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है।
भाग 7 - जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना------।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
असमम जीवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।
जैहऊँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गवाई।
प्रसंग - इन पंक्तियों में राम लक्ष्मण के बिना अपने जीवन को पूरी तरह से व्यर्थ बताते हुए अयोध्या लौटने पर लोक-निंदा के डर को व्यक्त कर रहे हैं।
व्याख्या - राम विलाप करते हुए कहते हैं कि हे लक्ष्मण, जिस प्रकार पंखों के बिना कोई पक्षी अत्यंत लाचार और दयनीय हो जाता है, जिस प्रकार मणि के बिना साँप और सूंड के बिना कोई श्रेष्ठ हाथी पूरी तरह बेअसर हो जाता है, ठीक उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी बिल्कुल बेकार हो जाएगा, यदि यह कठोर भाग्य मुझे तुम्हारे बिना जिंदा रखता है।
राम कहते हैं कि मैं कौन सा मुँह लेकर वापस अयोध्या जाऊँगा। लोग मुझसे कहेंगे कि राम ने अपनी पत्नी सीता को बचाने के लिए अपने सगे और प्यारे भाई को गंवा दिया, मैं यह कलंक कैसे सहूँगा।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 खग अति दीना, मनि बिनु फनि और करिबर कर हीना पदों में बहुत ही सुंदर उपमा अलंकार का प्रयोग किया गया है।
2 भाई के खोने के दर्द के सामने पत्नी के खोने के दर्द को छोटा दिखाकर कवि ने भ्रातृ-प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाया है।
3 जौं जड़ दैव जिआवै मोही पंक्ति में ज वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार का सौंदर्य देखने को मिलता है।
4 भाषा पूरी तरह से स्वाभाविक और प्रवाहमयी है जिसमें करुण रस का उग्र रूप दिखता है।
भाग 8 - बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं-------।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।
प्रसंग - राम इस भाग में सहोदर भाई यानी एक ही माँ की कोख से जन्मे भाई के महत्व को दुनिया की हर सुख-सुविधा से बढ़कर मान रहे हैं।
व्याख्या - राम कहते हैं कि मैं संसार में पत्नी के खोने का अपयश और बदनामी सह लेता क्योंकि पत्नी की हानि भाई की हानि के सामने कोई बहुत बड़ी विशेष क्षति नहीं है। लेकिन हे भाई, अब मेरा यह निष्ठुर और कठोर हृदय तुम्हारी मृत्यु का दुख और समाज का कलंक दोनों एक साथ कैसे सहेगा।
राम एक बहुत बड़ी सच्चाई बताते हुए कहते हैं कि दुनिया में बेटा, धन, पत्नी, मकान और परिवार तो बार-बार मिल सकते हैं और नष्ट हो सकते हैं, लेकिन इस संसार में सगा सहोदर भाई दोबारा कभी नहीं मिल सकता। ऐसा विचार करके हे तात, तुम अपनी आँखें खोलो और नींद से जाग जाओ।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 मिलइ न जगत सहोदर भ्राता पंक्ति इस पूरे प्रसंग का मुख्य भाव सौंदर्य है जो सगे भाई के महत्व को सर्वोपरि बताता है।
2 बारहिं बारा पद में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार की सुंदर योजना की गई है।
3 अपलोकु सोकु सुत तोरा में स वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का सौंदर्य देखने को मिलता है।
4 चौपाई छंद की यह रचना पाठक के दिल में अपनों के प्रति आदर और प्रेम का गहरा भाव जगाती है।
भाग 9 - हर्षित भयु मँहीपति रावन। आनि कीन्ह पुनि कवन उपायन -------।
हर्षित भयु मँहीपति रावन। आनि कीन्ह पुनि कवन उपायन।
अपन कटक महुँ राम विलापा। सुनि कपि दल महुँ संसय व्यापा।
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।
प्रसंग - इस अंतिम भाग में भगवान राम के विलाप से दुखी वानर सेना के बीच हनुमान जी के संजीवनी बूटी लेकर अचानक आगमन का सुंदर वर्णन है।
व्याख्या - राम के इस विलाप की खबर सुनकर लंका का राजा रावण बहुत खुश होता है और वह युद्ध जीतने के लिए नए-नए उपाय सोचने लगता है। उधर राम के विलाप को सुनकर वानर सेना के भीतर गहरा दुख और संशय फैल जाता है।
प्रभु राम के रोने की आवाज़ सुनकर सभी बानर और भालू व्याकुल हो उठते हैं। ठीक उसी समय हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लंका के मैदान में अचानक आ जाते हैं।
हनुमान जी का वह आगमन ऐसा लगता है मानो चारों तरफ फैले हुए करुण रस के माहौल के बीच अचानक वीर रस का उदय हो गया हो, जिससे पूरी सेना में दोबारा जोश भर जाता है।
विशेष और भाव सौंदर्य -
1 आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस सोरठा छंद की यह अंतिम पंक्ति इस पूरे प्रसंग का सबसे सुंदर उदाहरण है जिसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है।
2 वानर सेना की निराशा और हनुमान जी के आने से छाए उत्साह का बहुत ही सुंदर और सजीव चित्रण मिलता है।
3 भाषा बिल्कुल सरल अवधी है जो बिना किसी कठिन शब्द के सीधे दृश्य को आँखों के सामने ला देती है।
4 अंत में सोरठा छंद का प्रयोग करके कविता के प्रवाह को एक बहुत ही सुखद और सकारात्मक मोड़ दिया गया है।
कवितावली और लक्ष्मण मूर्छा राम का विलाप कक्षा 12 हिंदी अभ्यास के प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1 - कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की गहरी समझ है ?
उत्तर - कवितावली के छंदों को पढ़ने से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि तुलसीदास को अपने समय के समाज में फैली आर्थिक विषमता, गरीबी और बेरोज़गारी की बहुत ही गहरी समझ थी।
उन्होंने साफ़ लिखा है कि उनके समय में किसान के पास खेती के साधन नहीं थे, बेरोज़गारी के कारण नौकरों को नौकरी नहीं मिल रही थी और व्यापारियों का व्यापार ठप पड़ा था। आजीविका न होने के कारण लोग इस कदर मजबूर और बेबस थे कि वे अपने बेटा-बेटी तक को बेचने के लिए तैयार हो जाते थे।
तुलसीदास ने भूख की इस आग को समुद्र की आग से भी बड़ा बताकर समाज की कड़वी सच्चाई को निर्भीकता से प्रकट किया है।
प्रश्न 2 - पेट की आग का शमन ईश्वर भक्ति रूपी मेघ ही कर सकता है, तुलसी का यह काव्य सत्य क्या आज के समय में भी प्रासंगिक है, तर्क सहित उत्तर दीजिए ?
उत्तर - तुलसीदास का यह काव्य सत्य कि पेट की आग को केवल भगवान राम रूपी बादल ही बुझा सकते हैं, आज के समय में भी पूरी तरह प्रासंगिक और सही है।
तुलसीदास के अनुसार जब मनुष्य अपनी तरफ से सारे प्रयास करके थक जाता है और समाज में चारों तरफ मंदी व अकाल फैल जाता है, तब केवल ईश्वर की कृपा और नैतिक आचरण ही समाज को सही रास्ता दिखा सकते हैं।
आज के आधुनिक युग में भी जब इंसान भारी मंदी, भुखमरी या प्राकृतिक आपदाओं से घिर जाता है, तब ईश्वर पर अटूट विश्वास ही उसे मानसिक संबल देता है और समाज में परोपकार की भावना जगाकर व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने में मदद करता है।
प्रश्न 3 - तुलसीदास ने अपनी जाति और सामाजिक पहचान को लेकर समाज के तानों का जवाब किस प्रकार दिया है और मसीत में सोइबो पद का क्या आशय है ?
उत्तर - तुलसीदास ने अपनी जाति और सामाजिक पहचान को लेकर समाज के रूढ़िवादी लोगों के तानों का जवाब बहुत ही बेबाकी और स्वाभिमान के साथ दिया है।
वे कहते हैं कि समाज चाहे उन्हें धूर्त कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें किसी की बेटी से अपने बेटे की शादी करके किसी की जाति नहीं बिगाड़नी है। वे खुद को केवल श्रीराम का गुलाम मानते हैं।
'मसीत में सोइबो' पद का आशय यह है कि वे किसी भी सामाजिक बंधन या धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर मस्जिद या किसी भी पवित्र एकांत स्थान पर बिना किसी डर के आराम से सो सकते हैं, उन्हें दुनिया के आडंबरों से कोई लेना-देना नहीं है।
प्रश्न 4 - लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम के विलाप में छिपे मानवीय रूप को कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर - लक्ष्मण के मूर्छित होने पर भगवान राम एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की तरह व्यवहार न करके एक साधारण व्याकुल मनुष्य की तरह रोने और विलाप करने लगते हैं। वे अपने भाई को गले से लगाकर अतीत की यादों को याद करते हैं और कहते हैं कि लक्ष्मण उनके लिए कितने दयालु थे।
राम का यह रूप दिखाता है कि जब कोई अपना बहुत प्रिय संकट में होता है, तो भगवान भी इंसानी भावनाओं और दुखों से अछूते नहीं रहते। उनका यह विलाप भाई के प्रति उनके अगाध प्रेम, कर्तव्य और समाज में होने वाली लोक-निंदा के गहरे मानवीय डर को साफ प्रकट करता है।
प्रश्न 5 - भाई के वियोग में राम ने लक्ष्मण की तुलना किन-किन उपमानों से की है और सहोदर भाई का क्या महत्व बताया है ?
उत्तर - भाई के वियोग में राम ने लक्ष्मण की तुलना तीन बहुत ही सुंदर और लाचार उपमानों से की है। वे कहते हैं कि लक्ष्मण के बिना उनका जीवन वैसा ही बेकार हो जाएगा जैसा पंखों के बिना किसी पक्षी का जीवन, मणि के बिना किसी साँप का जीवन और सूंड के बिना किसी श्रेष्ठ हाथी का जीवन लाचार हो जाता है।
राम सहोदर भाई का महत्व बताते हुए कहते हैं कि इस संसार में बेटा, धन, पत्नी, मकान और परिवार तो बार-बार मिल सकते हैं और नष्ट हो सकते हैं, लेकिन एक ही माँ की कोख से जन्मा सगा सहोदर भाई दोबारा कभी नहीं मिल सकता।
प्रश्न 6 - आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस पंक्ति के माध्यम से कवि ने युद्ध के मैदान के किस बदलते माहौल को दर्शाया है ?
उत्तर - इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने युद्ध के मैदान में छाए हुए गहरे शोक और निराशा के माहौल के अचानक उत्साह और जोश में बदल जाने की स्थिति को दर्शाया है।
लक्ष्मण की मूर्छा और राम के करुण विलाप के कारण पूरी वानर सेना दुखी, व्याकुल और हताश हो चुकी थी। चारों तरफ करुण रस का माहौल फैला हुआ था।
ठीक उसी समय हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लंका के मैदान में अचानक आ जाते हैं। हनुमान जी का वह आगमन वानर सेना में दोबारा नया जीवन और उत्साह भर देता है, जिससे वह दुखी माहौल तुरंत वीर रस यानी शौर्य और उमंग में बदल जाता है।
पाठ समापन - तुलसीदास की कवितावली और लक्ष्मण मूर्छा राम का विलाप
तो प्यारे विद्यार्थियों, इस पूरी कविता को विस्तार से पढ़ने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तुलसीदास केवल एक धार्मिक कवि नहीं थे, बल्कि वे अपने समाज की समस्याओं और इंसानी रिश्तों की गहराइयों को बहुत अच्छे से समझते थे।
एक शिक्षक के रूप में मेरी आपको यही सलाह है कि जीवन में अपनी नैतिक मर्यादाओं को कभी न छोड़ें और अपने परिवार व भाई-बहनों के प्रति हमेशा आदर व अटूट प्रेम बनाए रखें।
परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके दोनों प्रसंगों से प्रसंग व्याख्या और बड़े प्रश्न उत्तर अक्सर पूछे जाते हैं। आशा है कि आपको यह संपूर्ण अध्याय बहुत अच्छे से समझ आ गई होगी।
