कक्षा 12 हिंदी जैनेन्द्र कुमार बाजार दर्शन महत्वपूर्ण व्याख्या और प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स

कक्षा 12 हिंदी जैनेन्द्र कुमार बाजार दर्शन महत्वपूर्ण व्याख्या और प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स 


इस पोस्ट में आज हम NCERT, CBSE, RBSE बोर्ड कक्षा 12 परीक्षा की अच्छी तैयारी करने के लिए अनिवार्य हिंदी के पाठ जैनेंद्र कुमार जी के निबंध 'बाजार दर्शन' का लेखक परिचय, सप्रसंग व्याख्या, भाषा-शैली और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर की जानकारी नोट्स के रूप में जानेंगे।

 इस पोस्ट में सम्पूर्ण जानकारी बहुत ही सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया गया है ताकि आप अपनी तैयारी को मजबूत कर सकें -
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लेखक परिचय - जैनेंद्र कुमार 


जीवन और मुख्य पहचान - जैनेंद्र कुमार का जन्म सन् 1905 में अलीगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ था। आप हिंदी साहित्य में मनोवैज्ञानिक उपन्यास धारा के प्रवर्तक और एक अत्यंत महत्वपूर्ण निबंधकार माने जाते हैं। आपकी मृत्यु सन् 1990 में हुई थी।

कक्षा 12 हिंदी जैनेन्द्र कुमार बाजार दर्शन महत्वपूर्ण व्याख्या और प्रश्न उत्तर
कक्षा 12 हिंदी जैनेन्द्र कुमार बाजार दर्शन महत्वपूर्ण व्याख्या और प्रश्न उत्तर



प्रमुख रचनाएँ - आपके प्रमुख उपन्यासों में परख, अनामस्वामी, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी शामिल हैं। कहानी संग्रहों में वातायन, दो चिड़ियाँ, पाजेब और निबंध संग्रहों में प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।



मुख्य पुरस्कार - आपको अपने महान साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान और देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म भूषण से नवाजा गया था।



साहित्यिक विशेषताएँ - आपकी रचनाओं में मानवीय मनोविज्ञान, दर्शन और समाज के आर्थिक ढाँचे पर गहरा चिंतन दिखाई देता है। इस पाठ में भी आपने बाजार की जादुई ताकत और उपभोक्तावादी संस्कृति पर तीखा प्रहार किया है।


 जैनेन्द्र कुमार  - बाजार दर्शन पाठ की महत्त्वपूर्ण  व्याख्या 

व्याख्या 1

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

बाजार में एक जादू है। वह जादू आंख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है, पर जैसे चुम्बक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मयार्दा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है, तो बाजार की अनेकानेक चीजों का निमंत्रण उस तक पहुंच जाएगा। कहीं हुई उस वक्त जेब भरी, तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है।




प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित जैनेंद्र कुमार द्वारा लिखित प्रसिद्ध विचारात्मक निबंध बाजार दर्शन से ली गई हैं। इसमें लेखक ने बाजार के चकाचौंध भरे आकर्षण और मानव मन पर पड़ने वाले उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या - लेखक स्पष्ट करते हैं कि बाजार में एक अनोखा सम्मोहन या जादू होता है। यह जादू मनुष्य की आँखों के रास्ते उसके दिमाग पर नियंत्रण करता है। बाजार में सजी-धजी सुंदर वस्तुएँ देखकर व्यक्ति उनकी ओर खिंचा चला जाता है।

लेकिन जैसे चुंबक केवल लोहे को आकर्षित करता है, वैसे ही बाजार के जादू की भी एक सीमा है। यह जादू उन लोगों पर सबसे ज्यादा असर करता है जिनकी जेब में पैसा तो होता है, लेकिन उनका मन खाली होता है अर्थात उन्हें यह पता नहीं होता कि उन्हें वास्तव में क्या खरीदना है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति फिजूलखर्ची कर बैठता है।

यदि जेब खाली हो परंतु मन भरा न हो, तो भी बाजार का आकर्षण व्यक्ति को असंतोष से भर देता है। खाली मन वाले व्यक्ति को बाजार की हर चीज अपने लिए जरूरी लगने लगती है और वह अपनी क्रय शक्ति का घमंड दिखाने के लिए अनावश्यक सामान खरीद लेता है।

विशेष -

  1. बाजार के आकर्षण की तुलना चुंबक के जादू से करके बात को बहुत प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है।
  2. गद्यांश में मन खाली होना और जेब भरी होना जैसे प्रतीकों का बहुत ही सटीक प्रयोग किया गया है।
  3. भाषा अत्यंत शुद्ध, तर्कसंगत और मर्मस्पर्शी है।



व्याख्या 2

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

पैसे की उस परचेजिंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है। लेकिन नहीं, लोग संयमी भी होते हैं। वे फिजूल सामान को फिजूल समझते हैं। वे पैसा बहाते नहीं हैं और बुद्धिमान होते हैं। बुद्धि और विवेक के बल पर वे मनी-बैग को दरकाते रहते हैं। वे जानते हैं कि पैसे की पावर क्या है, पर उसका प्रदर्शन उन्हें कतई पसंद नहीं होता। वे अपनी आवश्यकताओं को भली-भाँति जानते हैं और बाजार के रूप-जाल में फँसने की अपेक्षा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही मर्यादित आचरण करते हैं।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश जैनेंद्र कुमार के निबंध बाजार दर्शन से उद्धृत है। इसमें लेखक ने समाज के दो अलग-अलग वर्गों की तुलना करते हुए संयमी और बुद्धिमान लोगों के धन के प्रति दृष्टिकोण को रेखांकित किया है।

व्याख्या - लेखक कहते हैं कि कुछ लोग पैसे की परचेजिंग पावर अर्थात क्रय शक्ति के प्रदर्शन में ही जीवन का आनंद मानते हैं। वे अपनी ताकत दिखाने के लिए बेकार का सामान खरीदते हैं। 

लेकिन समाज में इसके विपरीत कुछ ऐसे संयमी लोग भी होते हैं जो बहुत बुद्धिमान होते हैं। वे फिजूल के सामान को पूरी तरह से व्यर्थ समझते हैं और अपना पैसा पानी की तरह नहीं बहाते। वे अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करके अपने धन को सुरक्षित रखते हैं।

 ऐसे लोग पैसे की वास्तविक शक्ति से अच्छी तरह परिचित होते हैं, परंतु वे समाज के सामने उसका दिखावा करना पसंद नहीं करते। वे केवल अपनी वास्तविक और जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही बाजार का उपयोग करते हैं और बाजार की चकाचौंध के जाल में फँसकर अपनी आर्थिक मर्यादा को कभी नहीं लाँघते।

विशेष -

  • विवेकशील और संयमी मनुष्यों के चरित्र की श्रेष्ठता को बहुत अच्छे ढंग से उभारा गया है।
  • परचेजिंग पावर और मनी-बैग जैसे अंग्रेजी शब्दों का हिंदी में व्यावहारिक प्रयोग हुआ है।
  • तत्सम शब्दों से युक्त गंभीर और वैचारिक भाषा शैली का प्रयोग हुआ है।

व्याख्या 3

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

बाजारूपन से क्या तात्पर्य है ? जो लोग बाजार को सार्थकता प्रदान नहीं कर सकते, वे बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं। वे अपनी परचेजिंग पावर के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति, एक शैतानी शक्ति, एक व्यंग्य की शक्ति ही बाजार को देते हैं। न तो वे बाजार से असली लाभ उठा सकते हैं और न उस बाजार को उसका सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं, जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। कपट की बढ़ती का मतलब परस्पर में भाईचारे का ह्रास है।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेंद्र कुमार रचित बाजार दर्शन पाठ से ली गई हैं। यहाँ लेखक ने बाजारूपन की परिभाषा देते हुए उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण समाज में कम होते मानवीय संबंधों और कपट की भावना को उजागर किया है।

व्याख्या - लेखक बताते हैं कि बाजारूपन का अर्थ दिखावे के लिए बाजार का उपयोग करना और समाज में छल-कपट को बढ़ावा देना है। जो लोग अपनी वास्तविक जरूरतों को जाने बिना केवल धन के घमंड में खरीदारी करते हैं, वे बाजार को एक विनाशक और शैतानी शक्ति में बदल देते हैं।

 ऐसे लोग न तो स्वयं बाजार से कोई सच्चा सुख प्राप्त कर पाते हैं और न ही बाजार को उसका वास्तविक उद्देश्य दे पाते हैं। वे ग्राहकों और दुकानदारों के बीच के पवित्र रिश्ते को नष्ट कर देते हैं। इस व्यवस्था में केवल लाभ-हानि का खेल चलता है, जिससे समाज का आपसी भाईचारा और सद्भाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है। एक का नुकसान दूसरे का फायदा बन जाता है, जो सामाजिक ताने-बाने के लिए अत्यंत घातक है।

विशेष -

  • उपभोक्तावाद के कारण मानवीय मूल्यों और भाईचारे के ह्रास पर तीखा प्रहार है।
  • विनाशक शक्ति और शैतानी शक्ति जैसे शब्दों के प्रयोग से व्यंग्य को बहुत प्रभावशाली बनाया गया है।
  • वाक्य रचना सरल है जो आर्थिक और सामाजिक कड़वे सच को साफ दिखाती है।

व्याख्या 4

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

चूर्ण वाले भगत जी के लिए बाजार की चकाचौंध का कोई मूल्य नहीं था। उनका मन अडिग था। वे हर रोज केवल छह आने की कमाई का नियम रखते थे। जैसे ही छह आने पूरे होते, वे बचा हुआ चूर्ण बच्चों को मुफ्त बाँट देते थे। यदि वे चाहते तो इस व्यापार से बहुत सारा धन कमा सकते थे, परंतु उनके भीतर थोड़ा सा भी लोभ नहीं था। बाजार उनके सामने फैला रहता था, चाँदनी चौक की विलासिता उन्हें आमंत्रित करती थी, परंतु उनका निश्चित मन अपनी जरूरत के अनुसार केवल जीरा और काला नमक खरीदने के लिए ही पंसारी की दुकान पर रुकता था।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश जैनेंद्र कुमार द्वारा लिखित बाजार दर्शन पाठ से लिया गया है। इस अंश में लेखक ने चूर्ण बेचने वाले भगत जी के संतोषी स्वभाव और बाजार के आकर्षण पर उनकी नैतिक विजय का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है।

व्याख्या - लेखक का कहना है कि भगत जी के चरित्र से हमें बाजार के जाल से बचने की सबसे बड़ी प्रेरणा मिलती है। बाजार का बड़े से बड़ा आकर्षण भी भगत जी के मन को विचलित नहीं कर सकता था। 

वे प्रतिदिन केवल छह आने कमाने के संकल्प के साथ चूर्ण बेचते थे और जैसे ही उनकी यह निश्चित कमाई पूरी हो जाती, वे शेष चूर्ण को व्यावसायिक लाभ के लिए न बेचकर बच्चों में मुफ्त वितरित कर देते थे। उनमें धन संग्रह करने का कोई लालच नहीं था। 

पूरा बाजार अपनी संपूर्ण विलासिता और सुंदर वस्तुओं के साथ उनके सामने खुला रहता था, परंतु उनका मन पूरी तरह शांत और केंद्रित था। उन्हें बाजार की बड़ी-बड़ी दुकानों से कोई सरोकार नहीं था। वे सीधे पंसारी की सादा दुकान पर जाते थे और अपनी जरूरत का जीरा और नमक खरीदकर संतुष्ट भाव से घर लौट आते थे।

विशेष -

  1. भगत जी के चरित्र के माध्यम से अपरिग्रह और परम संतोष के मानवीय आदर्श को दिखाया गया है।
  2. गद्यांश की शैली बहुत ही प्रेरक और नैतिक मूल्यों से भरपूर है।
  3. सरल और व्यावहारिक शब्दों के प्रयोग से भगत जी की महानता जीवंत हो उठी है।

व्याख्या 5

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

मन खाली रखने का मतलब यह नहीं है कि वह मन शून्य हो जाए। शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है, जो सनातन भाव से संपूर्ण है। मनुष्य तो अपूर्ण है, इसलिए उसमें इच्छाएँ उठना स्वाभाविक है। इच्छाओं का निरोध कर लेना अर्थात उन्हें जबरदस्ती दबा देना तो झूठ है। वह तो हठयोग है, जिससे मन संकीर्ण और पीला पड़ जाता है। सच्चा संयम वह नहीं है जो आँखें बंद करके बाजार से भागने को कहे, बल्कि सच्चा संयम वह है जो बाजार की सार्थकता को समझे और अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसका उपयोग करे।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेंद्र कुमार जी के निबंध बाजार दर्शन से ली गई हैं। यहाँ लेखक ने मन खाली रखने और मन को जबरदस्ती शून्य करने के बीच के दार्शनिक अंतर को बहुत ही तार्किक ढंग से स्पष्ट किया है।

व्याख्या - लेखक स्पष्ट करते हैं कि बाजार के जादू से बचने के लिए मन को खाली न रखने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य अपने मन की सभी इच्छाओं को पूरी तरह मार दे और शून्य हो जाए। पूर्ण रूप से शून्य होने की शक्ति केवल ईश्वर के पास है क्योंकि वही सर्वशक्तिमान और संपूर्ण है।

 मनुष्य स्वभाव से अपूर्ण है, इसलिए उसके मन में इच्छाओं और कामनाओं का उत्पन्न होना पूरी तरह स्वाभाविक है। अपनी इच्छाओं को बलपूर्वक दबाना केवल एक ढोंग या हठयोग है, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व कुंठित, संकीर्ण और कमजोर हो जाता है। 

वास्तविक संयम बाजार से डरकर भागने में या आँखें बंद कर लेने में नहीं है, बल्कि बाजार की उपयोगिता को समझकर अपनी वास्तविक जरूरतों के अनुसार विवेकपूर्ण तरीके से उसका लाभ उठाने में है।

विशेष -

  1. मनुष्य की अपूर्णता और सच्ची इच्छा के दार्शनिक स्वरूप को बहुत ही सुंदर ढंग से दिखाया गया है।
  2. शून्य होना और हठयोग जैसे दार्शनिक शब्दों के प्रयोग से विषय की गंभीरता स्पष्ट होती है।
  3. भाषा प्रवाहपूर्ण, तार्किक और अत्यंत रोचक है।

बाजार दर्शन पाठ के सभी प्रश्न और उनके  उत्तर -



प्रश्न 1 - बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है ?

उत्तर - लेखक के अनुसार जब मनुष्य पर बाजार का जादू चढ़ता है, तो वह बाजार की सजी-धजी और फैंसी वस्तुओं के आकर्षण में पूरी तरह फँस जाता है। उस समय उसे बाजार की हर बेकार और अनावश्यक चीज भी अपने ऐश-ओ-आराम के लिए बहुत जरूरी लगने लगती है। 

वह अपनी क्रय शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए बहुत सारा फालतू सामान खरीद लेता है। परंतु जब बाजार का यह जादू उतरता है, तो मनुष्य को वास्तविक रूप में यह अहसास होता है कि फैंसी चीजें उसके आराम को बढ़ाने की बजाय उसके एकांत और शारीरिक सुख में बाधा उत्पन्न कर रही हैं।

 जादू उतरने पर उसे अपनी फिजूलखर्ची पर पछतावा होता है और वह मानसिक अशांति का अनुभव करता है।



प्रश्न 2 - बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है ? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज को शांति देने में मददगार हो सकता है ?

उत्तर - बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनका अद्भुत आत्म-नियंत्रण, अटूट संतोष और अपरिग्रह की भावना है। बाजार की असीम चकाचौंध और चाँदनी चौक की विलासिता भी उनके मन में तनिक भी लोभ उत्पन्न नहीं कर पाती। 

वे अपनी आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह स्पष्ट हैं और केवल अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए ही बाजार जाते हैं। हमारी नजर में भगत जी का यह आचरण समाज में शांति और संतुलन स्थापित करने में अत्यंत मददगार साबित हो सकता है। 


यदि समाज के सभी लोग भगत जी की तरह संतोषी स्वभाव अपना लें, तो समाज से अनावश्यक आर्थिक प्रतिस्पर्धा, जमाखोरी, कालाबाजारी और आपसी ईर्ष्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी और एक शांत समतावादी समाज का निर्माण होगा।



प्रश्न 3 - बाजारूपन से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के लोग बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार से लाभ उठा सकते हैं  ?

उत्तर - बाजारूपन का अर्थ है बाजार का दिखावे के लिए उपयोग करना, अनावश्यक वस्तुओं को खरीदकर कपट बढ़ाना और केवल अपनी परचेजिंग पावर का घमंड दिखाना। जब ग्राहक और दुकानदार का रिश्ता केवल एक-दूसरे को ठगने का माध्यम बन जाता है, तो उसे बाजारूपन कहते हैं। 

इसके विपरीत वे लोग बाजार को वास्तविक सार्थकता प्रदान करते हैं जो अपनी जरूरतों को भली-भाँति जानते हैं और केवल अपनी आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए ही बाजार का उपयोग करते हैं। 

ऐसे विवेकशील लोग बाजार से उसकी सही उपयोगिता प्राप्त करके असली लाभ उठाते हैं और बाजार को भी उसके सही उद्देश्य में सफल बनाते हैं।

प्रश्न 4 - बाजार दर्शन निबंध में लेखक ने किस प्रकार के मन की स्थितियों का वर्णन किया है ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर - लेखक ने निबंध में मुख्य रूप से मानव मन की चार स्थितियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। पहली स्थिति है खाली मन की, जहाँ मनुष्य को अपनी जरूरत का ज्ञान नहीं होता और वह बाजार के जादू का शिकार हो जाता है। दूसरी स्थिति है भरे मन की, जहाँ मनुष्य का मन अपने लक्ष्यों के प्रति स्पष्ट होता है और उस पर बाजार का जादू काम नहीं करता। 

तीसरी स्थिति है बंद मन की, जहाँ मनुष्य हठपूर्वक अपनी स्वाभाविक इच्छाओं को जबरन दबाने का प्रयास करता है जो कि अनुचित है। चौथी स्थिति है विकृत मन की, जो केवल दिखावे, ईर्ष्या और कपट की भावना से ग्रस्त होकर बाजार का बाजारूपन बढ़ाता है।




प्रश्न 5 - पैसे की व्यंग्य शक्ति से लेखक का क्या आशय है? यह मनुष्य को किस प्रकार प्रभावित करती है ?

उत्तर - पैसे की व्यंग्य शक्ति से लेखक का आशय धन की उस क्रूर और मूक ताकत से है जो गरीब व्यक्ति को उसकी लाचारी और दरिद्रता का अहसास कराकर मानसिक रूप से पीड़ित करती है। यह शक्ति मनुष्य को बहुत गहराई से प्रभावित करती है। 

उदाहरण के लिए, जब सड़क पर पैदल चल रहे किसी व्यक्ति के पास से कोई चमचमाती हुई मोटर गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल जाती है, तो पैसे का वह मूक व्यंग्य उस व्यक्ति के हृदय को चीर देता है। वह अपनी ही माँ-बहन या भाग्य पर दोष मढ़ने लगता है और उसे महसूस होने लगता है कि उसने किसी अमीर घर में जन्म क्यों नहीं लिया। यह व्यंग्य शक्ति मनुष्य को अपनों के प्रति भी कृतघ्न बना देती है।



जैनेन्द्र कुमार बाजार दर्शन पाठ समापन -


प्रिय छात्रों, आज हमने बाजार दर्शन पाठ का संपूर्ण अध्ययन बहुत ही सरल भाषा में और बोर्ड परीक्षा के नियमों के अनुसार पूरा कर लिया है। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि हमें बाजार के आकर्षण का गुलाम बनने की बजाय अपनी आवश्यकताओं के प्रति सदैव जागरूक और विवेकशील रहना चाहिए।

 आप इन सभी व्याख्याओं और प्रश्न उत्तर को अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखकर अवश्य अभ्यास करें ताकि परीक्षा में आपको पूरे अंक प्राप्त हो सकें। आज की पोस्ट अच्छी लगी तो अपने साथियों को भी अवश्य शेयर करें। 

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