कक्षा 12 हिंदी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - शिरीष के फूल महत्वपूर्ण व्याख्या प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शिरीष के फूल
लेखक परिचय - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
लेखक परिचय - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
जीवन और मुख्य पहचान - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। आप छायावादोत्तर युग के प्रख्यात निबंधकार, श्रेष्ठ आलोचक और महान उपन्यासकार माने जाते हैं। आपकी मृत्यु सन् 1979 में हुई थी।
प्रमुख रचनाएँ - आपके प्रसिद्ध निबंध संग्रहों में अशोक के फूल, कल्पलता, आलोक पर्व, कुटज शामिल हैं। उपन्यासों में बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
मुख्य पुरस्कार - आपको अपने निबंध संग्रह आलोक पर्व के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया गया था।
साहित्यिक विशेषताएँ - आपकी रचनाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, मानवतावाद और प्रकृति के माध्यम से जीवन दर्शन को समझाने की अद्भुत कला दिखाई देती है। इस पाठ में भी आपने शिरीष के पेड़ के माध्यम से विपरीत परिस्थितियों में भी जिजीविषा बनाए रखने का संदेश दिया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शिरीष के फूल महत्वपूर्ण व्याख्या
व्याख्या 1
व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ
जहाँ बैठ कर यह लेख लिख रहा हूँ, वहाँ आस-पास शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में, जब धरित्री निर्धूम अग्निकुंड बनी हुई है, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया है। कम ही ऐसे फूल हैं, जो गगनमंडल को झुलसाने वाली लू में भी इस प्रकार हँस सकते हैं। अमलतास भी कुछ दिनों के लिए फूलता है, पर वह तो वसंत के आते ही विदा हो जाता है। शिरीष तो वसंत के आगमन से लेकर भादों के महीने तक एकरस बना रहता है। वह इस भीषण गर्मी में भी अवधूत की तरह अडिग खड़ा रहता है।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित प्रसिद्ध ललित निबंध शिरीष के फूल से ली गई हैं। इसमें लेखक ने जेठ की भीषण गर्मी और लू के बीच शिरीष के पेड़ की अपराजेय सहनशीलता का सजीव वर्णन किया है।
व्याख्या - लेखक जहाँ बैठकर अपनी रचना लिख रहे हैं वहाँ चारों तरफ शिरीष के पेड़ हैं। इस समय जेठ के महीने की भीषण और तपती हुई गर्मी पड़ रही है। गर्मी के कारण धरती बिना धुएँ के धधकते हुए अग्निकुंड जैसी दिखाई देती है। इस झुलसा देने वाली भयानक लू में भी शिरीष का पेड़ सुंदर फूलों से पूरी तरह लदा हुआ है। ले
खक कहते हैं कि संसार में बहुत कम ऐसे फूल होते हैं जो ऐसी भयंकर तपन में भी इस तरह खिलखिला कर हँस सकते हैं। अमलतास जैसे सुंदर फूल भी केवल वसंत ऋतु के कुछ अच्छे दिनों में ही खिलते हैं। वे मौसम के बदलते ही बहुत जल्दी मुरझा कर गायब हो जाते हैं।
इसके विपरीत शिरीष का पेड़ वसंत ऋतु की शुरुआत से लेकर भादों मास की कड़कती धूप तक निरंतर एक समान खिला रहता है। वह इस भीषण कष्टकारी वातावरण में भी किसी महान संन्यासी की तरह पूरी तरह शांत, स्थिर और अडिग खड़ा रहता है।
विशेष -
- प्रकृति के माध्यम से विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने का संदेश बहुत सुंदर ढंग से दिया गया है।
- गद्यांश में निर्धूम अग्निकुंड और अवधूत जैसे उत्कृष्ट प्रतीकात्मक विचारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
- छोटे और स्पष्ट वाक्यों के कारण भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और समझने में आसान है।
व्याख्या 2
व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ
शिरीष का फूल अद्भुत अवधूत है। दुख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। जब वायुमंडल शुष्क हो जाता है, वनस्पति के प्राण सूखने लगते हैं, तब भी वह न जाने कहाँ से रस खींचकर अपने स्वरूप को कोमल और हरा-भरा बनाए रखता है। कबीरदास भी इसी प्रकार के अवधूत थे, जो संसार के दुखों और आकर्षणों से ऊपर उठ चुके थे। जो कवि अनासक्त नहीं रह सकता, जो संसार के उतार-चढ़ाव में खो जाता है, वह सच्चा कवि नहीं हो सकता। शिरीष हमें यही सिखाता है कि अपने भीतर एक अचल गहराई रखो, जिससे बाहरी तपन तुम्हें नष्ट न कर सके।
प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध शिरीष के फूल से उद्धृत है। इसमें लेखक ने शिरीष के पेड़ की तुलना संत कबीरदास और एक सच्चे अनासक्त कवि से करते हुए मानसिक सुदृढ़ता के महत्व को उभारा है।
व्याख्या - लेखक स्पष्ट करते हैं कि शिरीष का फूल एक विलक्षण संन्यासी की तरह होता है। जीवन में सुख आए या दुख, वह कभी विचलित नहीं होता और हालातों के सामने कभी हार नहीं मानता है। तेज गर्मी के कारण जब पूरा वायुमंडल सूख जाता है और अन्य पेड़-पौधों के प्राण संकट में आ जाते हैं, तब भी शिरीष न जाने हवा के किस अज्ञात कोने से जीवन का रस खींच लेता है।
वह इस रस के बल पर स्वयं को हमेशा कोमल और हरा-भरा बनाए रखता है। हमारे इतिहास में महान संत कबीरदास भी इसी प्रकार के अवधूत थे। कबीरदास संसार के दुखों और आकर्षणों से पूरी तरह ऊपर उठ चुके थे। लेखक के अनुसार एक सच्चा और श्रेष्ठ कवि भी वही हो सकता है जो सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह अनासक्त रहे।
जो व्यक्ति दुनिया के छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव में खो जाता है वह कभी महान रचना नहीं कर सकता है। शिरीष हमें सिखाता है कि अपने मन को अंदर से हमेशा शांत और गहरा रखो ताकि बाहरी मुश्किलें हमें नष्ट न कर सकें।
विशेष -
- शिरीष के माध्यम से मानसिक दृढ़ता और कबीर के जीवन दर्शन को समझाया गया है।
- आंतरिक आत्मिक शक्ति के महत्व को तार्किक रूप में उभारा गया है।
- वाक्यों को छोटा और अर्थपूर्ण रखा गया है जो तुरंत समझ आते हैं।
व्याख्या 3
व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ
संसार का यह नियम अत्यंत क्रूर है कि पुराना पत्ता झड़ता है और उसकी जगह नया पत्ता आता है। परंतु शिरीष के पेड़ के साथ एक विचित्र बात यह होती है कि इसके पुराने फल नए फूलों के आ जाने पर भी अपनी जगह नहीं छोड़ते। वे तब तक अपनी डालियों से चिपके रहते हैं जब तक कि नए फल-फूल उन्हें धक्का मारकर बाहर नहीं निकाल देते। मुझे इन बुड्ढे फलों को देखकर उन आधुनिक नेताओं और शासकों की याद आती है जो समय बदलने पर भी अपनी गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं होते। वे भूल जाते हैं कि मौत और परिवर्तन से कोई बच नहीं सकता।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित शिरीष के फूल पाठ से ली गई हैं। यहाँ लेखक ने शिरीष के पुराने और सूखे फलों के माध्यम से समाज के उन रूढ़िवादी लोगों और नेताओं पर तीखा प्रहार किया है जो समय के साथ युवा पीढ़ी को स्थान नहीं देते।
व्याख्या - लेखक बताते हैं कि इस संसार का नियम बहुत ही कठोर है कि पुरानी चीजें नष्ट होती हैं और उनका स्थान नई चीजें लेती हैं। जैसे पुराना पत्ता झड़ जाता है और उसकी जगह नया कोमल पत्ता आता है। परंतु शिरीष के पेड़ के साथ एक बहुत ही अजीब बात दिखाई देती है।
वसंत ऋतु में जब पेड़ पर नए सुंदर फूल आ जाते हैं, तब भी इसके पुराने सूखे फल अपनी जगह छोड़ने का नाम नहीं लेते हैं। वे डालियों से मजबूती के साथ चिपके रहते हैं। अंततः जब नए पत्ते और फल बड़े होते हैं, तब वे इन पुराने फलों को धक्का मारकर नीचे गिरा देते हैं।
लेखक को इन सूखे फलों को देखकर देश के आधुनिक स्वार्थी नेताओं की याद आती है। वे नेता भी अपनी उम्र और समय बदलने पर भी अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होते हैं। वे युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर नहीं देते हैं। वे भूल जाते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और इस दुनिया में मौत से कोई भी बच नहीं सकता है।
विशेष -
1. प्रकृति के माध्यम से आधुनिक स्वार्थी राजनीति और रूढ़िवादिता पर तीखा व्यंग्य है।
2. पीढ़ीगत अंतर और बदलाव की आवश्यकता को बहुत सरल रूप में दिखाया गया है।
3. वाक्य छोटे हैं जो संसार के इस क्रूर कड़वे सच को साफ प्रकट करते हैं।
व्याख्या 4
व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ
कालिदास ने शिरीष के फूलों की कोमलता की बहुत प्रशंसा की है। उनका मानना था कि शिरीष के फूल केवल भँवरों के पैरों का दबाव ही सहन कर सकते हैं, पक्षियों के पैरों का भारी बोझ वे कभी नहीं उठा सकते। परंतु कोमल होने का अर्थ यह नहीं है कि वह कमज़ोर है। उसका तना अत्यंत मजबूत होता है, जो बड़े-बड़े बवंडरों और आँधियों को सह लेता है। बाहरी रूप से कोमल और आंतरिक रूप से वज्र के समान कठोर होना ही महान व्यक्तित्व का लक्षण है। हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी ऐसे ही थे, जो बाहर से अत्यंत विनम्र थे, परंतु उनके संकल्प फौलाद जैसे थे।
प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित शिरीष के फूल पाठ से लिया गया है। इस अंश में लेखक ने महाकवि कालिदास के विचारों का उल्लेख करते हुए कोमलता और कठोरता के सुंदर संतुलन को महात्मा गांधी के चरित्र से जोड़ा है।
व्याख्या - लेखक कहते हैं कि संस्कृत के महान कवि कालिदास ने शिरीष के फूलों की सुकुमारता की बहुत प्रशंसा की है। कालिदास का मानना था कि शिरीष के फूल अत्यधिक नाजुक होते हैं। वे केवल छोटे भँवरों के कोमल पैरों का दबाव ही सहन कर सकते हैं। किसी भारी पक्षी के पैरों का बोझ वे कभी नहीं उठा पाते हैं और तुरंत टूट जाते हैं।
परंतु लेखक यहाँ स्पष्ट करते हैं कि बाहरी रूप से कोमल होने का अर्थ कमज़ोर होना नहीं होता है। शिरीष के पेड़ का तना अत्यधिक मजबूत और शक्तिशाली होता है। वह बड़े-बड़े तूफानों, बवंडरों और आँधियों के वेग को भी आसानी से सह लेता है। लेखक के अनुसार बाहर से कोमल और अंदर से वज्र के समान कठोर होना ही एक महान इंसान की पहचान है।
हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चरित्र भी ऐसा ही था। वे शरीर से दुबले और व्यवहार से अत्यंत विनम्र थे। परंतु देश की आज़ादी के लिए उनके संकल्प फौलाद जैसे अटूट और मजबूत थे।
विशेष -
- कालिदास के कथन द्वारा कोमलता और आंतरिक शक्ति के अद्भुत संतुलन को दिखाया गया है।
- गद्यांश की शैली बहुत ही सरल, रोचक और तुलनात्मक है।
- बाहरी कोमलता और आंतरिक वज्रता के माध्यम से महान व्यक्तित्व की पहचान जीवंत हुई है।
व्याख्या 5
व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ
आज चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। खून-खराबा, आगजनी और देश में दंगे फैले हुए हैं। मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। ऐसे में मुझे बार-बार शिरीष की याद आती है। जब देश में चारों तरफ हिंसा और अराजकता का वातावरण था, तब साबरमती का वह बूढ़ा अवधूत अपनी कुटिया में बैठकर शांति, अहिंसा और प्रेम का संदेश दे रहा था। वह भी शिरीष की तरह ही विपरीत परिस्थितियों से जीवन-रस खींच रहा था। आज शिरीष हमारे बीच खड़ा होकर यही मूक प्रश्न पूछ रहा है कि क्या तुम भी इस हताशा के युग में अपनी आस्था और जिजीविषा को बचाकर रख सकते हो।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ शिरीष के फूल निबंध का अंतिम निष्कर्ष हैं। यहाँ लेखक ने देश विभाजन और दंगों के समय की अशांत स्थिति की तुलना शिरीष के पेड़ से करते हुए गांधीवादी दर्शन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला है।
व्याख्या - लेखक समाज में मचे चारों तरफ के हाहाकार को देखकर अत्यधिक दुखी हैं। देश में हर ओर हिंसा, खून-खराबा और दंगे फैले हुए हैं। इंसानी मूल्य और आपसी भाईचारा पूरी तरह नष्ट हो रहे हैं। ऐसे संकट के समय लेखक को बार-बार शिरीष के पेड़ की याद आती है।
जब भारत के विभाजन के समय देश में चारों तरफ नफ़रत की आग लगी थी, तब साबरमती के आश्रम में महात्मा गांधी जैसा एक बूढ़ा संन्यासी बैठा हुआ था। वे अपनी कुटिया में शांति से रहकर पूरे देश को अहिंसा और प्रेम का रास्ता दिखा रहे थे। गांधी जी भी शिरीष के पेड़ की तरह ही थे। वे चारों ओर फैली इस हिंसक तपन के बीच भी अपनी आत्मिक शक्ति से समाज को प्रेम का अमृत दे रहे थे।
अंत में लेखक कहते हैं कि आज शिरीष हमारे सामने खड़ा होकर बिना शब्दों के एक गंभीर प्रश्न पूछ रहा है। वह हमसे पूछ रहा है कि क्या तुम भी इस निराशा के युग में अपनी हिम्मत, आस्था और जीने की इच्छा को सुरक्षित रख सकते हो।
विशेष -
- देश की अशांत स्थिति और गांधी जी के अवधूत रूप पर सुंदर प्रकाश डाला गया है।
- जीने की इच्छा (जिजीविषा) के महत्व को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रकट किया गया है।
- सभी वाक्य छोटे, मर्मस्पर्शी और समझने में अत्यंत आसान हैं।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शिरीष के फूल महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
- प्रश्न 1 - लेखक ने शिरीष को 'अद्भुत अवधूत' (संन्यासी) क्यों कहा है?उत्तर - लेखक ने शिरीष को अद्भुत अवधूत इसलिए कहा है क्योंकि वह एक सच्चे संन्यासी की तरह व्यवहार करता है। संन्यासी सुख-दुख में हमेशा शांत और मस्त रहता है। ठीक उसी तरह शिरीष का पेड़ भी जेठ महीने की झुलसाने वाली प्रचंड धूप और जानलेवा लू में बिना विचलित हुए फूलों से लदा रहता है। वह भयंकर कष्ट में भी वायुमंडल से जीवन का रस खींच लेता है। वह हर हाल में हरा-भरा और कोमल बना रहता है। उसकी यह अपराजेय सहनशीलता केवल एक महान संन्यासी में ही संभव है।
- प्रश्न 2 - कबीर और कालिदास की किस साहित्यिक विशेषता के कारण लेखक ने उन्हें शिरीष के समान माना है?उत्तर - लेखक के अनुसार कबीरदास और महाकवि कालिदास दोनों ही अनासक्त योगी की तरह थे। कबीरदास संसार के दुखों के बीच रहकर भी पूरी तरह फक्कड़ और मस्त बने रहे। उन पर बाहरी बुराइयों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वहीं कालिदास भी अपनी व्यक्तिगत वेदना से ऊपर उठकर प्रकृति के सौंदर्य का निष्पक्ष वर्णन कर सके। लेखक का मानना है कि सच्चा कवि वही हो सकता है जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना अपने भीतर एक स्थिर गहराई रखे। इसी मानसिक अनासक्ति के कारण लेखक ने इन दोनों महान कवियों को शिरीष के समान माना है।
- प्रश्न 3 - 'हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कहीं आवश्यक हो जाती है।' पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।उत्तर - पाठ में महाकवि कालिदास ने शिरीष के फूलों को अत्यंत कोमल माना है जो केवल भँवरों के पैरों का भार सह सकते हैं। परंतु लेखक स्पष्ट करते हैं कि कोमल होने का अर्थ कमज़ोर होना नहीं है। शिरीष के फूल जितने नाजुक होते हैं, उसके फल उतने ही वज्र के समान कठोर होते हैं जो सालभर आँधियों का सामना करते हैं। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने आंतरिक कोमल मानवीय मूल्यों जैसे दया और प्रेम की रक्षा करने के लिए बाहरी रूप से नियमों और सिद्धांतों के प्रति कठोर होना पड़ता है। यदि व्यक्ति बाहरी तौर पर अत्यधिक लचीला हो जाएगा, तो समाज की स्वार्थी ताकतें उसकी कोमलता को आसानी से कुचल देंगी।
- प्रश्न 4 - द्विवेदी जी ने शिरीष के पुराने और सूखे फलों के माध्यम से समाज को क्या संदेश दिया है?उत्तर - द्विवेदी जी ने देखा कि शिरीष के पुराने फल नए वसंत के आने पर भी अपनी डालियों से मजबूती से चिपके रहते हैं। वे तब तक नहीं हटते जब तक कि नए फल-फूल बड़े होकर उन्हें धक्का नहीं मार देते। इसके माध्यम से लेखक ने समाज को यह संदेश दिया है कि परिवर्तन और मृत्यु संसार का शाश्वत नियम है। जो पुरानी व्यवस्था या पीढ़ी बुज़ुर्ग हो चुकी है, उसे समय की मांग को पहचानकर ससम्मान और सहर्ष नई युवा पीढ़ी के लिए अपना स्थान छोड़ देना चाहिए। अधिकार की भावना से चिपके रहना केवल उपहास और पतन का कारण बनता है।
- प्रश्न 5 - शिरीष के फूल निबंध का मूल संदेश या प्रतिपाद्य क्या है?उत्तर - इस ललित निबंध का मूल संदेश यह है कि मनुष्य को परिस्थितियों का रोना रोने के बजाय अपने आंतरिक आत्म-विश्वास के बल पर हर संकट का सामना करना चाहिए। लेखक ने शिरीष के पेड़ को एक प्रतीक बनाकर यह समझाया है कि आज के स्वार्थ और निराशा से भरे युग में भी यदि मनुष्य चाहे, तो वह गांधी जी की तरह सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर समाज में प्रेम का रस बिखेर सकता है। यह निबंध हमें घोर अंधकार में भी अपनी आस्था, मानवीय संवेदनाओं और जीने की इच्छा (जिजीविषा) को सुरक्षित रखने की महान प्रेरणा देता है।