कक्षा 12 हिंदी श्रम विभाजन और जाति प्रथा महत्वपूर्ण व्याख्या प्रश्न उत्तर । सम्पूर्ण नोट्स

श्रम विभाजन और जाति प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज - डॉ. भीमराव आंबेडकर

SK HINDI SIR के ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। इस पोस्ट में आज हम NCERT, CBSE, RBSE बोर्ड कक्षा 12 परीक्षा की अच्छी तैयारी करने के लिए अनिवार्य हिंदी के पाठ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जी के लेख 'श्रम विभाजन और जाति प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज' का लेखक परिचय, सप्रसंग व्याख्या, भाषा-शैली और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर की सरल जानकारी नोट्स के रूप में जानेंगे।

 इस पोस्ट में सम्पूर्ण जानकारी बहुत ही सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया गया है ताकि आप अपनी बोर्ड परीक्षा  तैयारी को मजबूत कर सकें -


कक्षा 12 हिंदी  श्रम विभाजन और जाति प्रथा महत्वपूर्ण व्याख्या प्रश्न उत्तर
कक्षा 12 हिंदी  श्रम विभाजन और जाति प्रथा महत्वपूर्ण व्याख्या प्रश्न उत्तर



लेखक परिचय - डॉ. भीमराव आंबेडकर

  • जीवन और मुख्य पहचान - डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म सन् 1891 में महू, मध्य प्रदेश में हुआ था। आप स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के निर्माता माने जाते हैं। शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले बाबा साहेब की मृत्यु सन् 1956 में दिल्ली में हुई थी।


  • प्रमुख रचनाएँ - आपकी प्रसिद्ध अंग्रेजी कृतियों में द कास्ट्स इन इंडिया, एनिहिलेशन ऑफ कास्ट, द बुद्धा एंड हिज धम्मा, थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स शामिल हैं। हिंदी में आपका संपूर्ण वाङ्मय भारत सरकार द्वारा बाबा साहेब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय नाम से 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है।


  • मुख्य पुरस्कार - आपके महान सामाजिक, विधिक और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों के लिए आपको मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभोषित किया गया था।


  • साहित्यिक विशेषताएँ - आपके लेखन में तार्किकता, समतावादी दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के प्रति गहरी निष्ठा दिखाई देती है। इस पाठ में भी आपने जाति प्रथा के आर्थिक व सामाजिक दुष्प्रभावों को उजागर करते हुए एक स्वतंत्र और समतामूलक समाज का खाका खींचा है।


व्याख्या 1

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। इसमें मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का कोई स्थान या महत्व नहीं रहता। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी यह कि बहुत से लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त कर देती है।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित प्रसिद्ध वैचारिक लेख श्रम विभाजन और जाति प्रथा से ली गई हैं। इसमें लेखक ने जाति प्रथा के आधार पर होने वाले काम के बँटवारे की कमियों और उसके मनोवैज्ञानिक कुप्रभावों का तार्किक विश्लेषण किया है।

व्याख्या - लेखक स्पष्ट करते हैं कि जो लोग जाति प्रथा का समर्थन करते हैं और इसे केवल काम का बँटवारा (श्रम विभाजन) मानते हैं, वे पूरी तरह गलत हैं। समाज में काम का वास्तविक बँटवारा मनुष्य की इच्छा, योग्यता और उसकी पसंद को देखकर होना चाहिए।

परंतु जाति प्रथा में मनुष्य का पेशा उसके जन्म से पहले ही, उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार तय कर दिया जाता है। इस व्यवस्था में व्यक्ति की अपनी इच्छा और रुचि का कोई मूल्य नहीं होता। लेखक का मानना है कि आधुनिक युग के कारखानों में गरीबी से भी बड़ी समस्या यह है कि जातिगत नियमों के कारण करोड़ों लोगों को ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनमें उनकी कोई रुचि नहीं होती।

जब व्यक्ति मजबूरी में कोई काम करता है, तो उसका मन काम में नहीं लगता, जिससे समाज में निराशा, अकर्मण्यता और मानसिक तनाव बढ़ता है।

विशेष -


1.जाति प्रथा के कारण उत्पन्न होने वाले मनोवैज्ञानिक और आर्थिक संकट को बहुत तार्किक ढंग से दर्शाया गया है।

2.गद्यांश में स्वाभाविक विभाजन और विवशतावश कार्य जैसे गंभीर विचारों का बहुत ही सटीक प्रयोग किया गया है।

3.भाषा अत्यंत गंभीर, विश्लेषणात्मक और मर्मस्पर्शी है।


व्याख्या 2

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

जाति प्रथा मनुष्य को जीवनभर के लिए एक ही पेशे में बांध देती है। भले ही वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके कारण भुखमरी और बेरोजगारी फैलना बिल्कुल स्वाभाविक है।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश डॉ. भीमराव आंबेडकर के लेख श्रम विभाजन और जाति प्रथा से उद्धृत है। इसमें लेखक ने आधुनिक औद्योगिक विकास के संदर्भ में जाति प्रथा को बेरोजगारी और भुखमरी का एक मुख्य कारण सिद्ध किया है।

व्याख्या - लेखक कहते हैं कि जाति प्रथा की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि यह व्यक्ति को एक ही काम में हमेशा के लिए जकड़ देती है। भले ही वह काम समाज के बदलते स्वरूप में पूरी तरह बेकार हो चुका हो या उससे व्यक्ति की न्यूनतम जरूरतें भी पूरी न हो रही हों।

आज का युग विज्ञान और नई तकनीक का युग है, जहाँ रातों-रात फैक्ट्रियों और व्यापार के तरीके बदल जाते हैं। ऐसी स्थिति में जीवित रहने के लिए मनुष्य को पुराना काम छोड़कर नया काम सीखने और पेशा बदलने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए।

परंतु भारतीय समाज में जातिगत रूढ़ियाँ व्यक्ति को अपनी जाति से बाहर जाकर कोई दूसरा पेशा अपनाने की अनुमति नहीं देतीं। यही कारण है कि जब पारंपरिक काम ठप हो जाते हैं, तो लोग भुखमरी और बेरोज़गारी का शिकार हो जाते हैं।

विशेष -

1.आधुनिक अर्थव्यवस्था में जाति प्रथा के घातक आर्थिक परिणामों को बहुत अच्छे ढंग से उभारा गया है।

2.तकनीक में परिवर्तन और पेशा बदलने की स्वतंत्रता के अंतर्संबंधों को दिखाया गया है।

3.तत्सम और विचार-प्रधान शब्दों से युक्त तार्किक भाषा शैली का प्रयोग हुआ है।


व्याख्या 3

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

मेरी कल्पना का आदर्श समाज तीन तत्वों पर आधारित होगा-स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता। भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रसारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए और सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन और अवसर उपलब्ध होने चाहिए। इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर रचित मेरी कल्पना का आदर्श समाज पाठ से ली गई हैं। यहाँ लेखक ने समतावादी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए तीन मूलभूत सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए वास्तविक लोकतंत्र की परिभाषा दी है।

व्याख्या - लेखक बताते हैं कि एक सच्चे और प्रगतशील समाज का ढाँचा कैसा होना चाहिए। उनके अनुसार आदर्श समाज वह है जहाँ हर व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार जीने की आज़ादी (स्वतंत्रता) हो, सभी को समान अधिकार (समता) प्राप्त हों और सबके बीच आपसी प्रेम व भाईचारा (भ्रातृता) हो।

समाज इतना लचीला और गतिशील होना चाहिए कि यदि समाज की भलाई के लिए कोई नया विचार या परिवर्तन आए, तो वह बिना किसी भेदभाव के समाज के सबसे निचले व्यक्ति तक आसानी से पहुँच सके। समाज के सभी संसाधनों और सुखों पर सबका समान अधिकार होना चाहिए।

जब समाज का हर व्यक्ति एक-दूसरे से बिना किसी डर या छुआछूत के मिल सकेगा, तभी सच्चे लोकतंत्र की स्थापना होगी क्योंकि लोकतंत्र केवल सरकार चुनने का नाम नहीं है, बल्कि यह आपस में मिलकर जीने की एक जीवन पद्धति है।

विशेष -

1.स्वतंत्र भारत के लिए लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों पर तीखा प्रहार करते हुए सुंदर मार्ग दिखाया गया है।

2.स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता के त्रिसूत्र के माध्यम से आदर्श समाज की नींव को बहुत प्रभावशाली बनाया गया है।

3.वाक्य रचना सरल और सुबोध है जो सामाजिक समरसता के सच को साफ दिखाती है।


व्याख्या 4

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

फ्रांसीसी क्रांति के नारे में समता शब्द हमेशा विवादास्पद रहा है। समता के आलोचक कह सकते हैं कि सभी मनुष्य समान नहीं होते। यह तर्क पूर्णतः सत्य है, क्योंकि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती है-शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और मनुष्य के अपने प्रयत्न। इन तीनों कारणों से मनुष्य निश्चित रूप से असमान होते हैं। परंतु क्या इस असमानता के कारण समाज को भी उनके साथ असमान व्यवहार करना चाहिए। एक श्रेष्ठ समाज का कर्तव्य है कि वह अपने सभी सदस्यों को समान अवसर प्रदान करे ताकि वे अपनी पूरी क्षमता का विकास कर सकें।

प्रसंग - प्रस्तुत गद्यांश डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित मेरी कल्पना का आदर्श समाज पाठ से लिया गया है। इस अंश में लेखक ने समानता (समता) के सिद्धांत पर उठने वाले सवालों का उत्तर देते हुए सामाजिक न्याय के व्यावहारिक रूप को स्पष्ट किया है।

व्याख्या - लेखक समानता के दार्शनिक और व्यावहारिक रूप पर विचार करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि दुनिया में कोई भी दो मनुष्य पूरी तरह एक जैसे नहीं हो सकते। हर व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य, उसका पारिवारिक परिवेश, उसकी शिक्षा और उसकी खुद की मेहनत अलग-अलग होती है, जिसके कारण समाज में स्वाभाविक रूप से अंतर आ जाता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जो व्यक्ति कमज़ोर बैकग्राउंड से आया है, उसे समाज में आगे बढ़ने के अधिकार से ही वंचित कर दिया जाए। एक सभ्य और आदर्श समाज का यह दायित्व है कि वह सभी को शुरुआत में विकास के एक जैसे अवसर और संसाधन दे, ताकि कोई भी अपनी गरीबी या जाति के कारण पीछे न छूट जाए। असली समता का मतलब अवसर की समानता है।

विशेष -

1.मानवीय क्षमताओं के अंतर को स्वीकार करते हुए अवसर की समानता की आवश्यकता को बहुत ही तार्किक रूप में दिखाया गया है।

2.गद्यांश की शैली बहुत ही गंभीर, दार्शनिक और संवैधानिक मूल्यों से भरपूर है।

3.सामाजिक उत्तराधिकार जैसे सुंदर प्रशासनिक शब्दों के प्रयोग से भाषा जीवंत हो उठी है।


व्याख्या 5

व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण गद्यांश पंक्तियाँ

यदि समाज को अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तभी संभव है जब समाज के सभी सदस्यों को प्रारंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार उपलब्ध कराया जाए। समता का औचित्य इसी बात पर टिका है। एक राजनीतिज्ञ को बहुत बड़ी जनसंख्या से व्यवहार करना होता है, उसके पास हर व्यक्ति को अलग से जानने का समय नहीं होता। इसलिए उसे एक व्यावहारिक सिद्धांत अपनाना पड़ता है कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए। समता भले ही एक काल्पनिक वस्तु हो, परंतु व्यावहारिक राजनीति के लिए यही एकमात्र मार्ग है।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के लेख का अंतिम निष्कर्ष हैं। यहाँ लेखक ने समता को देश के सफल संचालन और राजनीतिक व्यवस्था के लिए एकमात्र अनिवार्य और व्यावहारिक नियम सिद्ध किया है।

व्याख्या - लेखक स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई देश या समाज यह चाहता है कि उसकी जनता अपनी पूरी प्रतिभा का उपयोग देश के विकास में करे, तो उसे हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार देने ही होंगे।

लेखक एक नेता या शासक का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि किसी भी सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह देश के करोड़ों लोगों की व्यक्तिगत कमियों और खूबियों को अलग-अलग परखने बैठे। इसलिए शासन चलाने का सबसे सरल और न्यायपूर्ण तरीका यही है कि कानून की नज़र में देश के अमीर, गरीब, सवर्ण और दलित सभी नागरिकों को पूरी तरह बराबर माना जाए।

भले ही पूरी दुनिया में सौ प्रतिशत समानता लाना कठिन हो, परंतु एक कल्याणकारी राज्य के संचालन के लिए समता का सिद्धांत ही सबसे व्यावहारिक और सर्वोत्तम रास्ता है।

विशेष -

1. देश के सफल संचालन और राजनीतिक न्याय पर बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकाश डाला गया है।

2. व्यावहारिक सिद्धांत के माध्यम से समता के औचित्य को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रकट किया गया है।

3. भाषा प्रवाहपूर्ण, मर्मस्पर्शी और अत्यंत विचारणीय है।


बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पाठ के सभी प्रश्न और उनके सटीक उत्तर


प्रश्न 1 - लेखक के अनुसार जाति प्रथा भारतीय समाज में श्रम विभाजन का एक अस्वाभाविक रूप क्यों है 
?
उत्तर - लेखक के अनुसार जाति प्रथा श्रम विभाजन का एक अस्वाभाविक रूप इसलिए है क्योंकि यह मनुष्य की अपनी रुचि, क्षमता, योग्यता और उसकी पसंद पर आधारित नहीं होता। इस व्यवस्था में किसी व्यक्ति का काम उसके जन्म से पहले ही, उसके माता-पिता की जाति के अनुसार हमेशा के लिए तय कर दिया जाता है।

 यह विभाजन व्यक्ति को अपनी प्रतिभा दिखाने या अपनी पसंद का पेशा चुनने का अवसर नहीं देता, जिससे समाज में विवशता, असंतोष और कार्य के प्रति अरुचि पैदा होती है।




प्रश्न 2 - जाति प्रथा किस प्रकार भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का एक मुख्य कारण बनी हुई है ?
उत्तर - जाति प्रथा मनुष्य को जीवनभर के लिए केवल एक ही पारंपरिक पेशे से बांध देती है। आधुनिक युग में तेजी से बदलते उद्योगों, नई तकनीकों और आर्थिक परिवर्तनों के कारण जब किसी जाति का पुराना काम ठप हो जाता है, तो जातिगत नियमों के कारण व्यक्ति को दूसरा नया पेशा अपनाने की अनुमति नहीं मिलती। 

प्रतिकूल और बदलते समय में भी पेशा न बदल पाने की इसी कठोर सामाजिक पाबंदी के कारण लोग चाहकर भी नया काम नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप समाज में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और भुखमरी फैलती है।





प्रश्न 3 - लेखक डॉ. भीमराव आंबेडकर के अनुसार एक 'आदर समाज' के तीन मुख्य तत्व कौन-से हैं और वे क्यों आवश्यक हैं ?

उत्तर - लेखक के अनुसार एक आदर्श समाज के तीन मुख्य तत्व हैं - स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भाईचारा)। ये तीनों तत्व एक स्वस्थ और न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि स्वतंत्रता व्यक्ति को विकास की आज़ादी देती है, समता समाज के हर नागरिक को समान अधिकार और विकास के समान अवसर प्रदान करती है, तथा भ्रातृता समाज के लोगों को आपसी प्रेम, सहयोग और सद्भाव के धागे में बांधकर रखती है। इनके बिना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।




प्रश्न 4 - लेखक ने लोकतंत्र की क्या परिभाषा दी है? वह केवल एक शासन पद्धति क्यों नहीं है ?

उत्तर - लेखक के अनुसार लोकतंत्र केवल एक शासन पद्धति या सरकार चुनने का जरिया मात्र नहीं है। लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का दूसरा नाम है। 

इसका अर्थ यह है कि जिस समाज में लोग बिना किसी जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच या छुआछूत के एक-दूसरे के साथ अबाध संपर्क रखते हैं, आपस में सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते हैं तथा सामूहिक सुख-दुख में सहभागी बनते हैं, वही वास्तविक लोकतंत्र है।




प्रश्न 5 - मनुष्य की क्षमता किन तीन बातों पर निर्भर करती है? क्या इन आधारों पर समाज को व्यक्ति के साथ असमान व्यवहार करना उचित है ?

उत्तर - मनुष्य की क्षमता मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करती है - पहली, शारीरिक वंश-परंपरा (माता-पिता से मिलने वाले गुण), दूसरी, सामाजिक उत्तराधिकार (शिक्षा, पारिवारिक परिवेश और आर्थिक स्थिति), 

तथा तीसरी, मनुष्य के अपने स्वयं के प्रयत्न (उसकी खुद की मेहनत)। लेखक के अनुसार, इन आधारों पर मनुष्यों के बीच अंतर होना स्वाभाविक है, परंतु इस असमानता के कारण समाज को किसी भी व्यक्ति के साथ असमान या हीन व्यवहार नहीं करना चाहिए। 

एक न्यायपूर्ण समाज का कर्तव्य है कि वह सभी को समान अवसर दे ताकि हर कोई अपनी पूरी क्षमता का विकास कर सके।


पाठ समापन

प्रिय छात्रों, आज हमने श्रम विभाजन और जाति प्रथा तथा मेरी कल्पना का आदर्श समाज पाठ का संपूर्ण अध्ययन बहुत ही सरल भाषा में और बोर्ड परीक्षा के नियमों के अनुसार पूरा कर लिया है। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि एक महान राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाकर स्वतंत्रता, समानता और आपसी भाईचारे की भावना को मजबूत करना सबसे ज्यादा जरूरी है।

आप इन सभी व्याख्याओं और प्रश्न उत्तर को अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखकर अवश्य अभ्यास करें ताकि परीक्षा में आपको पूरे अंक प्राप्त हो सकें। आज की पोस्ट अच्छी लगी तो अपने साथियों को भी अवश्य शेयर करें।

अपने सहपाठियों को जोड़कर इस महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री का लाभ उठाने में उनकी सहायता करें। ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है इसलिए इस उपयोगी पोस्ट को अपने सभी मित्रों तक पहुँचाएँ।